Tokyo Olympics: यहीं नहीं रुकेंगी मीरा टोक्यो से शुरू हुए सफर को पेरिस ओलंपिक तक रखेंगी जारी
टोक्यो ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाली मीराबाई चानू का कहना है कि उनका यह मेडल देश में बेटियों के प्रति लोगों की सोच को बदलेगा। मीराबाई चानू वेटलिफ्टिंग में भारत की तरफ से सिल्वर मेडल जीतने वाली पहली महिला हैं।
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मीराबाई चानू की आंखों में खुशी के आंसू थम नहीं रहे हैं। रियो ओलंपिक में पदक से चूकने के बाद अवसाद में चली गईं मीरा ने पांच साल के संघर्ष के बाद आखिर ओलंपिक पदक देश के नाम कर ही दिया। भावुक मीरा टोक्यो से अमर उजाला को साफ करती हैं कि शायद उनका यह पदक देश में बेटियों के प्रति सोच को बदलेगा। अगर उनका यह पदक ज्यादा से ज्यादा बेटियों के माता-पिता को उन्हें खेलों की ओर मोडने को प्रेरित करेगा तो वह समझेंगी उनका पदक जीतना सफल रहा। मीराबाई ने अपनी दिल की बातें और आगे की योजनाओं को कुछ इस तरह सांझा किया है।
प्रश्न-कंपटीशन के दौरान कितना दबाव था और दर्द पर कैसे काबू पाया?
उत्तर-दबाव तो था, लेकिन मुझे इस बार अपने पर काफी भरोसा था। बस यही सोच रही थी कि एशियाई चैंपियनशिप की तरह यहां पहली लिफ्ट को गिराना नहीं है। पहली लिफ्ट पास होने के बाद दबाव चला गया। हालांकि मुझे कमर में दर्द हो रहा था, लेकिन मैंने अपने आपसे कहा कि ओलंपिक के लिए दर्द कुछ नहीं है। मैंने खुद को अहसास कराया कि मुझे कुछ नहीं है। दर्द को पी लिया जिससे वजन उठाने में मदद मिली।
प्रश्न-यह पदक किसको समर्पित करेंगी?
उत्तर-मेरा यह पदक समस्त देशवासियों के लिए है। उनकी दुआओं की बदौलत मुझे पदक नसीब हुआ है। अपनी मां को भी मैं यह पदक समर्पित करूंगी। उन्होंने मेरे लिए काफी त्याग किया है। कंपटीशन से पहले इसी लिए मैंने उनसे बात की थी। उन्होंने मेरे पदक के लिए आज सुबह से पानी भी नहीं पिया था। अब अपने माता-पिता के गले में यह पदक डालूंगी। वैसे मुझे लगता है कि मेरा यह पदक देश में बेटियों के प्रति मां-बाप की सोच को बदलेगा। माता-पिता अब ज्यादा से ज्यादा अपनी बेटियों को खेल की ओर मोड़ेंगे।
प्रश्न-आपने आज कंपटीशन के दौरान कानों में ओलंपिक रिंग्स डाल रखे थे। इसका खास कारण?
उत्तर-दरअसल 2018 में राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण जीतने के बाद जब मैं अपने घर गई तो मां ने मेरी ओलंपिक पदक की इच्छा को ध्यान में रखते हुए ओलंपिक के पांच छल्लों के ईयर रिंग बनवाकर दिए थे। इन ईयर रिंग्स को आज पहनने से अच्छा मौका और क्या हो सकता था। मां के दिए हुए ईयर रिंग्स उनके आर्शीवाद के साथ पहनें तो पदक आ गया।
प्रश्न-रियो ओलंपिक में हाथ से पदक निकलने के बाद पांच सालों से आप टोक्यो की तैयारियों में जुटी है। इस दौरान कितनी बार घर पर जाना हुआ?
उत्तर-रियो ओलंपिक में पदक खोना मेरे लिए बड़ा झटका था। मैं अवसाद में चली गई थी। वेटलिफ्टिंग संघ के महासचिव सहदेव यादव अगर मुझे रियो से लौटने के बाद अपने घर पर नहीं लेकर गए होते तो शायद पता नहीं क्या होता। उसके बाद उन्होंने टोक्यों की तैयारियों को ढाल बना लिया। पिछले पांच सालों में मैं सिर्फ तीन बार पांच-पांच दिनों के लिए घर गई हूं। अब सारी कसर पूरी कर दूंगी। मां-बाप की सेवा करूंगी। भाई-बहनों को खूब प्यार करूंगी।
प्रश्न-अब आगे की क्या योजना है? वेटलिफ्टिंग को कब तक जारी रखना है?
उत्तर-मैं वेटलिफ्टिंग अभी छोडने नहीं जा रही हूं। मेरा अगला लक्ष्य 2024 का पेरिस ओलंपिक है। मैं वहां भी टोक्यो की तरह झंडे गाडना चाहूंगी। घर से लौटने के बाद मैं पहले की तरह एक बार फिर तैयारियों में जुट जाऊंगी। मैं मैरी कॉम से प्रेरणा लेती हूं। वह इतनी उम्र में भी खेल रही हैं तो फिर मैं क्यों नहीं खेल सकती हूं।
उत्तर-हां, यह सही है कि मेरे परिवार ने बचपन में काफी संघर्ष किया है। खेतों से लकड़ी खाने का सामान लटकाकर घर में जमा कर लेते थे और उसी को खाते थे। अब वह समय निकल गया है। मां ने बहुत त्याग किया है। वह मुझे सुबह चार बजे उठा दिया करती थी। मेरा मन नहीं होता था लेकिन वह कहती थीं अभी वेटलिफ्टिंग सीख लेगी तो आगे काम आएगा। अब अगर पैसा मिला तो मां-बाप को एक बहुच अच्छा सा घर बनवाकर दूंगी। उनकी जो भी इच्छा होगी सब पूरी करूंगी। सबसे पहले तो घर जाकर मां के गले में अपना रजत पदक डाल दूंगी।