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रागिनी-सुखबीर तीरंदाजी में बने विश्व चैंपियन, नाराज रिश्तेदार भी अब दे रहे बधाई

Tue, 27 Aug 2019 08:30 AM IST
Rajeev Rai हेमंत रस्तोगी, अमर उजाला
हेमंत रस्तोगी, अमर उजाला Published by: Rajeev Rai Updated Tue, 27 Aug 2019 08:30 AM IST
सार

  • बेटी को हॉस्टल भेजने पर किया झगड़ा गोल्ड जीतने पर दे रहे बधाईयां 
  • थ्रोबॉल और हैंडबॉल के राष्ट्रीय चैंपियन रागिनी, सुखबीर तीरंदाजी में बने विश्व चैंपियन
  • पिता ने समाज से झगड़ा मोल लेकर बेटी को तीरंदाजी अकादमी भेजा

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throw ball and handball players Markoo Raginee and Sukhbeer Singh wins gold in world youth archery
रागिनी/सुखबीर - फोटो : social media

विस्तार

विश्व जूनियर तीरंदाजी चैंपियनशिप में मिक्स इवेंट का गोल्ड जीतने वाली रागिनी मार्को और सुखबीर सिंह के तीरंदाज बनने की कहानी अजीबो-गरीब है। थ्रोबॉल में राष्ट्रीय चैंपियन जबलपुर की रागिनी को उनके पिता ने व्यक्तिगत खेल अपनाने के लिए मध्य प्रदेश तीरंदाजी अकादमी के हॉस्टल में भेजा तो रिश्तेदारों ने कोहराम मचा दिया। सभी ने कहा कि लड़की है हॉस्टल में भेजने से बिगड़ जाएगी। रागिनी की मानें तो उनके एएसआई पिता से सभी रिश्तेदारों ने झगड़ा कर लिया। घर में तनाव का माहौल पैदा हो गया, लेकिन पिता ने रागिनी को हॉस्टल भेजने की जिद नहीं छोड़ी। 2017 में उनके पिता का यह फैसला जूनियर विश्व चैंपियनशिप के गोल्ड के रूप में रंग लाया है। रागिनी मैड्रिड से खुलासा करती हैं कि आज वही रिश्तेदार पिछले दो दिनों से उन्हें फोन पर लगातार बधाईयां देते हुए दुलार रहे हैं।

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पिता की जिद कर गई काम

रागिनी अमर उजाला को बताती हैं कि उस वक्त अगर उनके पिता मान सिंह ने उनके लिए लड़ाई नहीं लड़ी होती तो शायद वह आज यहां नहीं होतीं। उस वक्त पिता का साथ केवल मामा ने दिया था। आज वही रिश्तेदार घर आकर उनके पिता के फैसले की सराहना कर रहे हैं। रागिनी को जबलपुर अकादमी में भारतीय टीम के कोच रिछपाल सिंह ने तैयार किया है।
 

 

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स्कूल नहीं जाने पर बड़े भाई ने बना डाला तीरंदाज

फाइनल में 80 में से 79 का स्कोर करने वाले फिरोजपुर के सुखबीर सिंह हैंडबॉल में नेशनल तक खेल चुके थे। उनके बड़े भाई गुरलाल राष्ट्रीय स्तर के तीरंदाज रह चुके थे। सुखबीर खुलासा करते हैं कि घर वालों को हैंडबॉल पसंद नहीं था। वह स्कूल भी कम जाते थे बड़े भाई गुरलाल ने 2016 में एक दिन उनसे कहा कि हैंडबॉल छोड़ धनुष थाम ले। उसके बाद से वह पंजाबी यूनिवर्सिटी में कार्यरत भारतीय टीम के कोच सुरेंदर सिंह के साथ जुड़ गए। खास बात यह है कि जब दोनों तीरंदाजों ने मैड्रिड में गोल्ड जीता तो टीम के कोच भी सुरेंदर ही थे।

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