पापा और भाई का सपना पूरा करने उतर आई रिंग में हरियाणा की बेटी नीरज
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
वो पढ़ना चाहती थी। खेल से उसका दूर तक भी नाता नहीं था। पर पिता और भाई का ख्वाब पूरा करने के लिए वह 17 साल की उम्र में रिंग में उतर गई। चरखी दादरी के झिंझर गांव के किसान सुरेश की बिटिया नीरज अब रिंग की रानी बन चुकी हैं। उसका लक्ष्य अब अंतरराष्ट्रीय फलक पर चमकने का है।
वह जानती हैं कि डगर कठिन है पर उसके हौसले बुलंद हैं। बुल्गारिया के सोफिया में हाल ही में हुए स्ट्रांजा कप मुक्केबाजी में 60 किग्रा भार वर्ग में कांस्य पदक लेकर लौटी नीरज अब बैंकॉक में 19 से 27 अप्रैल तक होने वाली एशियन चैंपियनशिप की तैयारियों में जुटी हैं।
पहली बार महिला और पुरुषों की चैंपियनशिप एक साथ होगी। 25 वर्षीया नीरज कहती हैं मुझे टीम में जगह बनाने का पूरा भरोसा है। मैं इसके लिए खूब मेहनत कर रही हूं। मुझे पापा और भाई के सपने को पूरा करना है।
चोट के चलते भाई को छोड़नी पड़ी पहलवानी
नीरज कहती हैं पापा चाहते थे भाई पहलवानी में नाम कमाए। भाई हितेश भी पूरे मन से इसमें करियर बनाना चाहते थे। लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। अभ्यास के दौरान दो बार उनका लिगामेंट टूट गया। उनकी दो सर्जरी हुई। डॉक्टरों ने उन्हें कुश्ती से दूर रहने को कहा।
इससे पापा और भाई काफी निराश हुए। उन्हें दुखी देखकर मैंने रिंग में उतरने का मन बनाया। हालांकि पापा चाहते थे कि मैं भी पहलवान बनूं। पर मैं कुछ अलग करना चाहती थी। कॉलेज के दिनों के दौरान 2012 में मुक्केबाजी की शुरुआत करने वाली नीरज कहती हैं, मैं इस दौरान कभी गांव से अकेले भिवानी भी नहीं गई थी।
मेरी कोचिंग के लिए हितेश ने भी घर छोड़ दिया। हम दोनों भिवानी आ गए। हितेश प्रैक्टिस में मेरी मदद करने लगा। अब भी मैं जहां भी प्रैक्टिस के लिए जाती हूं वह मेरे साथ होता है। मुझे किसी चीज की कमी नहीं होने देता।
51 से बदला 60 किग्रा भार वर्ग
नीरज ने शुरुआत 51 किग्रा से की थी। इसमें उन्होंने 2016 में गुवाहाटी में हुई राष्ट्रीय चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद 2017 में पहली बार सर्बिया में हुए छह देशों के नेशंस कप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना पहला पीला तमगा जीता।
हालांकि पिछले साल नीरज ने अपना भार वर्ग बदलकर 60 किग्रा कर लिया। वह जनवरी में असम के विजयवाड़ा में हुई राष्ट्रीय चैंपियनशिप में 60 किग्रा में ही चैंपियन बनीं। वह कहती हैं 51 किग्रा में बहुत कड़ा मुकाबला है।
जब छोड़ना चाहती थीं खेल
नीरज कहती हैं कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गोल्डन पंच जड़ने के बाद भी गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल और जकार्ता एशियाई खेलों के लिए टीम में जगह नहीं बनाने का मुझे बहुत दुख हुआ।
मुझे लगा कि अब खेल छोड़ देना चाहिए। मैंने मन भी बना लिया था। लेकिन भाई और कोच संजय ने मुझे समझाया। उन्होंने मुझे भार वर्ग बदलने को कहा।
उनके कहने पर मैंने इसमें बदलाव किया और फिर अपनी मंजिल की और निकल पड़ी।