भूख के कारण हो जाते थे बेहोश, नीरज चोपड़ा ने कठिनाइयों से ऊपर उठकर देश को दिलाया गोल्ड
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नीरज चोपड़ा के गले में एशियाई खेलों का स्वर्ण हार और कंधों पर तिरंगा था। उनके लिए यह बेहद भावुक पल था और इसी भावुकता में वह पुरानी यादों में खो गए। उन्हें वह 2011 के वह दिन याद आ गए जब वह फिटनेस के लिए पानीपत के स्टेडियम में छह सौ मीटर का चक्कर लगा रहे थे और बेहतर डाइट नहीं होने की वजह से वह चक्कर खाकर बेहोश होकर गिर पड़े।
होश आया तो उठे और दौड़ लगाना शुरू कर दी। नीरज खुलासा करते हैं कि शुरूआत में बहुत कठिनाईयां आईं। राज्य स्तर के कंपटीशन में भी उनका मेडल नहीं आता था। वह बहुत निराश होते थे, बावजूद इसके उन्होंने कभी हौसला नहीं छोड़ा। वह लगातार अभ्यास करते रहे और सफलता ने कदम चूमना शुरू कर दिए।
आज भी उनकी सफलता का यही मूल मंत्र है कि वह बेहद कठिन अभ्यास करते हैं। नीरज यहां तक कहते हैं कि अगर शुरूआती दिनों की कठिनाईयां अब उठानी पड़ती तो उन्हें भाले को दूर रखने का फैसला लेना पड़ता। वाकई वह बहुत कठिन दिन थे।
जब नहीं मिलता था मेडल, फिर ऐसे सफल हुए नीरज
नीरज को अच्छी तरह याद है आठ साल पहले जब उन्होंने जेवेलिन थ्रो शुरू किया था तो दो-तीन साल प्रदर्शन अच्छा नहीं था। कहीं भी कोई पोजीशन नहीं आती थी। तब भी उन्होंने अभ्यास किया और धैर्य को बनाए रखा। नीरज कहते हैं कि उन्हें बस अपने पर विश्वास था। उनके पिता गांव से 15.16 किलोमीटर पानीपत के स्टेडियम उनकी फिटनेस ठीक कराने के लिए ले जाया करते थे।
उन्हें खुद नहीं मालूम था कि वह जेवेलिन थ्रोअर बनने वाले हैं। बचपन में कुश्ती और कबड्डी ही देखा है, लेकिन स्टेडियम में अंतरराष्ट्रीय जेवेलिन थ्रोअर जयवीर सिंह को देखा। उन्होंने ही सलाह दी कि जेवेलिन शुरू करो तो बस उसी वक्त भाला उठा लिया।
पक्का नहीं था बनूंगा खिलाड़ी
नीरज बताते हैं कि उनके परिवार में कोई भी खिलाड़ी नहीं था। उन्हें भी शुरूआत में नहीं मालूम था कि वह खेलों में उतरेंगे या नहीं था। सच्चाई यह है कि उनका खिलाड़ी बनना ही पक्का नहीं था। पहली बार जयवीर को देख जेवेलिन शुरू किया और उसी को अपना लिया।
इस दूरी पर आ सकता है ओलंपिक मेडल
नीरज का कहना है कि इस वक्त विश्व स्तर पर उनकी रैकिंग छह या सात है। जर्मनी के तीन तीन थ्रोअर एथलीट 90 से ऊपर। 88 से 90 तक की थ्रो पर ओलंपिक में मेडल नहीं आने का अवसर एक प्रतिशत ही है। वरना इतनी दूरी पर मेडल आ जाता है।