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एक्सक्लूसिव: बजरंग पूनिया बोले- टोक्यो में खेलकर नई ऊर्जा मिली, अगले ओलंपिक में मेडल का रंग बदलकर लाएंगे

Sun, 29 Aug 2021 07:17 AM IST
मुकेश कुमार झा स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मुकेश कुमार झा Updated Sun, 29 Aug 2021 07:17 AM IST
सार

बजरंग पूनिया की गिनती भारत के नामी पहलवानों में होती है। बजरंग अपने करियर में अभी तक छह स्वर्ण सहित 18 पदक जीत चुके हैं। प्रस्तुत है अर्जुन अवार्ड, पद्मश्नी और मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित पहलवान बजरंग पूनिया से अमर उजाला की विशेष बातचीत।

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EXCLUSIVE: Bajrang Punia says after Tokyo get new energy and will change the color of the medal in 2024 paris Olympics
बजरंग पूनिया से खास बातचीत - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

टोक्यो ओलंपिक में भारतीय पहलवान बजरंग पूनिया ने कांस्य पदक जीता। वे स्वर्ण पदक के दावेदार थे, लेकिन उनकी इंजरी और मूवमेंट के चलते वे सोना नहीं जीत पाए। इसकी टीस उनके मन में आज भी है। इस बात का खुलासा उन्होंने खुद किया है। खेल दिवस के मौके पर विशेष बातचीत में बजरंग ने कहा कि टोक्यो में मुझसे जो अपेक्षाएं थीं, वो तो मैं पूरी नहीं कर पाया, पर जो प्यार और आशीर्वाद मिला, उससे एक नई उर्जा मिल रही है कि 2024 (पेरिस ओलंपिक) में मेडल का रंग बदलकर लाएंगे। उसके लिए जी तोड़ मेहनत करेंगे। बजरंग पूनिया ने अमर उजाला डॉट कॉम से विशेष बातचीत की। पेश हैं प्रमुख अंश : 

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सवाल- आपके अंदर एक गहरी टीस दिखती है। आप बहुत आतुर हैं मेडल का रंग बदलने के लिए, क्या एक दिन में लगातार तीन कुश्ती खेलने से कोई दिक्कत हुई?
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जवाब- नहीं। कुश्ती तो एक दिन में चार-चार और पांच-पांच लड़ लेते हैं। उसकी कोई दिक्कत नहीं थी। दिक्कत इस बात की थी कि 20-25 दिन मैट की ट्रेनिंग मिस हुई, जो इस समय बहुत जरूरी थी। कई खिलाड़ियों को इंजरी चलती रहती है, लेकिन इतने बड़े टूर्नामेंट से पहले जो इंजरी हुई, वो मेरे लिए ज्यादा नुकसान कर गई।
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सवाल- आप तो खुद ही मिट्टी के पहलवान रहे हैं तो मिट्टी की कुश्ती से मैट की कुश्ती पर किस तरह का सांस्कृतिक बदलाव चाहिए, जिससे पहलवान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ओलंपिक के अखाड़े में मैट पर लड़ सकें?
जवाब- जब मैंने शुरुआत की थी, तब इतनी सुविधाएं नहीं थीं। मैं 2005 में अखाड़े में गया था, वहां पर मैट थी। मेरे गांव में कोई मैट नहीं थी। अभी सरकार ने काफी अच्छी सुविधाएं दी हैं। मेरे गांव में दो से तीन मैट हैं। बच्चे मैट से शुरुआत कर रहे हैं। जो राजा-महाराजाओं के समय में मिट्टी में कुश्तियां होती थीं, वो आज भी होती हैं। मगर मिट्टी की कुश्ती, ओलंपिक की कुश्ती नहीं है। जो मैट पर खेलते हैं, वो ओलंपिक की कुश्ती है। बच्चे अभी से ओलंपिक का अपना टारगेट लेकर चलते हैं कि मुझे सुशील, बजरंग और रवि की तरह ओलंपिक मेडल जीतना है, तो यही अंतर है।

सवाल- कुश्ती को सबसे ज्यादा अहमियत हरियाणा में मिलती है, क्या आने वाले दिनों में युवाओं को कुश्ती में आगे बढ़ाया जाएगा, चाहे वो किसी भी प्रांत से क्यों न हों?
जवाब- बिल्कुल। गेम में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे हरियाणा के खिलाड़ी ही कर सकते हैं। गेम हर कोई खेल सकता है। बस, आप में जज्बा होना चाहिए कि हां मुझे ये हासिल करना है, उसके लिए मेहनत करनी पड़ेगी। अच्छा खाना-पीना, अच्छे गुरुओं के साथ ट्रेनिंग करना, ये चीजें मायने रखती हैं। इसलिए जितने भी पहलवान हैं, जितने भी अच्छे अखाड़े हैं, वो दिल्ली में हैं, हरियाणा में हैं। हरियाणा में बोलते हैं दूध-दही-अखाड़ा। हरियाणा के खाने में कुदरती ताकत है। जितने भी ताकत वाले गेम हैं, उसमें ज्यादातर खिलाड़ी हमारे हरियाणा से आते हैं, चाहे कबड्डी हो या बॉक्सिंग या कुश्ती। कोई भी जो ताकत वाला गेम है तो उसमें हरियाणा के ज्यादा खिलाड़ी मिलेंगे।

सवाल- कुश्ती में बल और बुद्धि दोनों का तालमेल कैसे बिठाते हैं?
जवाब- देखिए, कुश्ती में बल भी, बुद्धि भी और स्टेमिना भी, हर चीज चाहिए। बोलते हैं कि पहलवान में जो दिमाग होता है, वो बिल्कुल कंप्यूटर की तरह होता है। मैट पर सोचने के लिए कुछ सेकंड का समय मिलता है कि यहां से कौन-सी टेक्निक लगाना है। जो हमारी डाइट होती है, वो सबसे अच्छी डाइट होती है। पहले बोलते थे कि पहलवानों में दिमाग नहीं होता। मेरा मानना है सबसे ज्यादा दिमाग पहलवानों में होता है। सबसे अच्छा खाना पहलवान खाते हैं।

सवाल- कुश्ती में हमेशा चर्चा चलती है कि दांव बादशाह है या ताकत बादशाह है? आपकी नजर में क्या?
जवाब- हमारी नजर में दांव बादशाह है। कोई अच्छी तकनीक आंखों को भी चकमा दे सकती है।

सवाल- पांच मिनट तक कुश्ती नहीं चलती है। पहलवान इनएक्टिव हो जाए तो एक-एक अंक इसका भी मिल जाता है, लेकिन आखिर में कोई फितले या भारंदाज मार दे तो कुश्ती का रंग बदल जाता है, इसके बारे में क्या कहेंगे?
जवाब- हमारे पहलवान अब किसी से कम नहीं हैं। आप अगर पिछले चार ओलंपिक को देखेंगे तो हमने देश को लगातार मेडल दिए हैं। हमारी छह मिनट की कुश्ती होती है और हम आखिरी 30 सेकंड तक लड़ते हैं।

सवाल- 29 अगस्त को हम मेजर ध्यानचंद की याद में खेल दिवस मनाते हैं। भारत में इस समय जो खेल सुविधाएं हैं, वो पर्याप्त हैं या और सुधार होना चाहिए?
जवाब- हर चीज को धीरे-धीरे सुधारा जाता है। पहले के मुकाबले खेल में काफी बदलाव हुआ है। अभी खुद प्रधानमंत्री जी ने टोक्यो जाने से पहले खिलाड़ियों से बात की। आने के बाद खिलाड़ियों को चाय पर बुलाया। यह अच्छी बात है कि हमारे देश के जो मुखिया हैं, वो खुद खिलाड़ियों से बात कर रहे हैं। खिलाड़ियों से बात करते हुए उन्होंने यही कहा कि आपको कभी भी किसी चीज की जरूरत हो तो हम हर चीज आपके लिए करेंगे। बस आप केवल देश के लिए खेलें और मेडल जीतें। इससे अच्छी कोई बात नहीं हो सकती। खेल में पहले से काफी सुविधाएं बढ़ी हैं। बीते कुछ वर्षों में मैंने खेल में काफी बदलाव देखे हैं। रही बात हॉकी के खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद जी की तो वो एक सुपर-डुपर खिलाड़ी थे, उनके बारे में जितना बोला जाए, उतना कम है।
 

सवाल- खेलों के सबसे बड़े पुरस्कार का नाम भी ध्यानचंद जी के ऊपर कर दिया गया है, आप इस बारे में क्या सोचते हैं?
जवाब- खेल का कोई भी अवार्ड हो, उसे खिलाड़ी के नाम पर ही होना चाहिए। सरकार की यह एक अच्छी सोच थी कि इस पुरस्कार को खिलाड़ी के नाम पर किया। इसका हम स्वागत करते हैं। जो भी खिलाड़ी इस पुरस्कार को जीतेगा, वो उस महान हस्ती को याद करेगा।

सवाल- कई लोग जानना चाहते हैं कि बजरंग पूनिया की दिनचर्या क्या है और उनका क्या खानपान है?
जवाब- सुबह-शाम ट्रेनिंग करते हैं। कैंप में होते हैं तो कोच का शेड्यूल फॉलो करते हैं। कैंप नहीं होता तो अखाड़े पर होते हैं। सुबह जल्दी उठते हैं। खाने-पीने की तो वही चीजें हैं। सप्लीमेंट के तौर पर कई चीजें और जुड़ जाती हैं। दूध, दही, अंडा, ड्राई फ्रूट्स, रोटी और दाल यही सब चीजें खाने में होती हैं। दंड बैठक टूर्नामेंट पर निर्भर करती है। वैसे, 800 से 1000 के बीच दंड बैठक लगा लेता हूं।

सवाल- बहुत से लोग अंग्रेजी नहीं बोल पाते हैं। ऐसे में हिंदी भाषा के लिए आप क्या कहना चाहेंगे?
जवाब- हम अंग्रेजी क्यों सीखें? हमारी मातृभाषा हिंदी है तो हम हिंदी में ही बोलेंगे।

सवाल- नए लड़के जो पहलवानी में आना चाहते हैं, वो बजरंग, योगेश्वर और रवि को देखते हैं लेकिन उस लेवल पर पहुंच नहीं पाते, वो एकदम से चाहते हैं कि ओलंपिक का मेडल जीत जाएं। उनके लिए आप क्या कहना चाहेंगे?
जवाब- एकदम से तो कुछ नहीं होता। अगर हमारा संघर्ष देखेंगे तो हम 2005 से घर से बाहर हैं और एकदम से तो हमने भी नहीं जीता था। धीरे धीरे ऊपर जाया जाता है। हमने भी अपनी तरह से यही कोशिश की है कि बेस्ट करें। स्टेप बाय स्टेप जाने से ही ओलंपिक मेडल मिलेगा। बस अपनी तरफ से टारगेट बनाकर रखें। कोई भी ऐसी मुश्किल चीज नहीं है जो आपको नहीं मिल सकती।

सवाल- किस तरह की कोचिंग लेना चाहिए, क्या ध्यान रखना चाहिए?
जवाब- कोचिंग की कोई कमी नहीं है। हमने मिट्टी के अखाड़े से ही कोचिंग शुरू की थी। हमारे देश में अच्छे कोच भी हैं, अच्छे गुरु भी हैं।  खिलाड़ी कहीं से भी कोचिंग ले, लेकिन ध्यान से उसे करे और अपने गुरुओं का सम्मान करे। कोच जो सिखा रहा है, उसे दिल से सीखें। ऐसा नहीं सोचें कि इसे कुछ आता ही नहीं।

सवाल- खेल दिवस के मौके पर युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे?
जवाब- खेल दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं। जिनके नाम पर खेल दिवस मनाया जाता है, वो अच्छे खिलाड़ी थे। उनके बारे में पढ़ें, उनके नक्शेकदम पर चलें और मेजर ध्यानचंदजी ने जो देश के लिए किया है, वैसे ही करने की कोशिश करें।


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