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वो पांच कदम जो भारत को टोक्यो में दिला सकते हैं पदक

Wed, 24 Aug 2016 05:48 PM IST
जुबैर अहमद, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
जुबैर अहमद, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Wed, 24 Aug 2016 05:48 PM IST
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5 reasons for india s more medals in olympics
पीवी सिंधू - फोटो : getty
रियो ओलंपिक खेलों में भारत को केवल दो पदक (साक्षी मलिक और पीवी सिंधू) मिले। अभिनव बिंद्रा और दीपा करमाकार चौथे नंबर पर आने की वजह से पदक हासिल करने से रह गए। जबकि भारतीय खिलाड़ी टेनिस के मिश्रित युगल के सेमीफाइनल में और तीरंदाजी में क्वार्टर फाइनल तक पहुंचने में सफल रहे। दूसरी ओर, हॉकी में भी पुरुष टीम का प्रदर्शन बुरा नहीं रहा।
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चीन की आबादी भारत से थोड़ी ही अधिक है लेकिन रियो में चीन पदक तालिका में सबसे ज्यादा पदक जीतने वाले देशों की सूची में अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर रहा। चीन की प्रगति सराहनीय है क्योंकि उसे पहला ओलंपिक पदक 1984 के लॉस एंजिलस खेलों में मिला था।
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अगले ओलंपिक खेल चार साल बाद 2020 में जापान में होंगे। क्या जापान में भारत का प्रदर्शन रियो से बेहतर होगा?

साथ ही भारत को ऐसे पांच कौन से कदम उठाने चाहिए कि उसकी चीन से बराबरी न सही कम से कम पदक तालिका बेहतर हो पाए।

खिलाड़ियों को तैयार करने के लिए निवेश जरूरी

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कुछ समय पहले 2008 के स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा ने ट्वीट करके कहा कि टीम जीबी (ग्रेट ब्रिटेन) के हर पदक के पीछे 50 लाख पौंड स्टर्लिंग का निवेश होता है। उन्होंने भारत को पदक जीतने से पहले खेलों में ढेर सारे पैसे निवेश करने की सलाह दी।

अभिनव बिंद्रा टीम जीबी के बारे में सोलह आने सही हैं। ब्रिटिश सरकार नेशनल लाटरी के जरिये बहुत पैसे कमाती है। इस कमाई का एक बड़ा हिस्सा खेलों को बढ़ावा देने पर खर्च किया जाता है।

सरकार 18 साल की एक योजना के तहत लाटरी की कमाई खेलों में झोंक रही है। नतीजा सब के सामने है।

भारत सरकार भी स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) को पैसे देती है ताकि खेलों को बढ़ावा मिले, लेकिन ये पैसे न केवल कम हैं बल्कि सिस्टम में भ्रष्टाचार के कारण पूरे पैसे खेलों में खर्च भी नहीं हो पाते हैं। केवल ढेर सारे पैसों का निवेश काफी नहीं होगा। पदक का लक्ष्य तय करना होगा और इसकी जवाबदेही भी तय करनी पड़ेगी।

देश में करियर के रूप में खेल संस्कृति की जरूरत

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पीवी सिंधू - फोटो : getty
जैसे डॉक्टर और इंजीनियर बनने के लिए युवा और उनके परिवार वाले पूरी ताकत लगा देते हैं वैसे ही खेलों को भी अगर वो करियर की तरह देखें तो देश में खेल संस्कृति पैदा होगी।

खेलों को बड़ी कंपनियों की अधिक स्पॉन्सरशिप मिल सकेगी। अगर टारगेट 2020 या 2024 में कुछ खेलों में स्वर्ण पदक हासिल करना है तो काम अभी से शुरू करना होगा।
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ध्यान क्रिकेट से आगे लगाना होगा

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टीम इंडिया - फोटो : getty
अगर क्रिकेट ओलंपिक खेलों में शामिल होता तो भारत को स्वर्ण पदक मिल सकता था। लेकिन क्रिकेट एक टीम स्पोर्ट है। ये आपको केवल एक ही पदक दिला सकता है। इसके बावजूद पूरा देश क्रिकेट का दीवाना है।

अगर ओलंपिक में पदक हासिल करना है तो ये दीवानगी थोड़ी कम करनी पड़ेगी।

जीतने वाली मानसिकता की कमी, सुधार की जरुरत

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अभिनव बिंद्रा - फोटो : getty
खेलों के कई विशेषज्ञ कहते हैं कि भारतीय खिलाड़ियों में कुछ कर दिखाने की प्रवृति नहीं दिखाई देती। जीत की मानसिकता और किलर स्टिंक्ट के कारण चौथे स्थान पाने वाले खिलाड़ी तीसरे नंबर पर आ सकते हैं और पदक तालिका बढ़ाई जा सकती है।

यह मानसिकता पैदा करने के लिए यूरोप और अमेरिका में अलग से प्रोग्राम चलाए जाते हैं।

खिलाड़ियों की सुविधाओं में विस्तार हो

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रियो ओलंपिक - फोटो : getty
अगरतला में दीपा कर्मकार को हासिल सुविधाएं अफसोसनाक हैं। अगर ये सुविधाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर की होती तो शायद दीपा आज एक पदक लेकर देश वापस लौटती।

ये सभी जानते हैं कि भारत में खेलों की सुविधाएं बहुत कम हैं। लेकिन ओलंपिक खेलों के बाद इस पर चर्चा तक नहीं होती।

क्या आपको मालूम है कि 2024 ओलंपिक खेलों को आयोजित करने की भारत में सलाहियत क्यों नहीं है ? क्योंकि यहां ओलंपिक स्तर की सुविधाएं नहीं हैं।

भारत को अगर ओलंपिक की महिमा चाहिए तो सुविधाओं में इजाफा करना होगा। इसके इलावा अच्छे कोच, अच्छी खुराक और अच्छी वर्जिश पर भी ध्यान देना होगा।
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