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किस्मत अच्छी थी कि मैं पास नहीं हो पाया: गोपीचंद
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
Updated Wed, 31 Aug 2016 10:48 PM IST
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पीवी सिंधू
- फोटो : PTI
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रियो ओलंपिक में सिल्वर मेडल विजेता पीवी सिंधू और लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता साइना नेहवाल के कोच रहे पूर्व स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी पुलेला गोपीचंद ने बैडमिंटन में अपने सफर के बारे में बताया।
गोपीचंद ने कहा कि वो शुरुआती पढ़ाई में उनके भाई काफी तेज थे। दोनों ही खेला करते थे, मगर उनके भाई ने आईआईटी का एग्जाम पास कर लिया और फिर खेलना छोड़ दिया। मगर गोपीचंद इस एग्जाम में पास नहीं हो सके और उन्होंने खेलना जारी रखा। वो खुद को लकी मानते हैं कि वो फेल हो गए।
दरअसल, देश को बैडमिंटन के कई प्रतिभावान खिलाड़ी दे चुके गोपीचंद का मानना है कि ओलंपिक जैसे मंच पर जीतने के लिए देश में ‘स्पोर्ट्स कल्चर’ बहुत जरूरी है।
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हालांकि भारत में इसके उलट कहावत मशहूर है- ‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे बनोगे खराब’
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गोपीचंद ने कहा कि वो शुरुआती पढ़ाई में उनके भाई काफी तेज थे। दोनों ही खेला करते थे, मगर उनके भाई ने आईआईटी का एग्जाम पास कर लिया और फिर खेलना छोड़ दिया। मगर गोपीचंद इस एग्जाम में पास नहीं हो सके और उन्होंने खेलना जारी रखा। वो खुद को लकी मानते हैं कि वो फेल हो गए।
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दरअसल, देश को बैडमिंटन के कई प्रतिभावान खिलाड़ी दे चुके गोपीचंद का मानना है कि ओलंपिक जैसे मंच पर जीतने के लिए देश में ‘स्पोर्ट्स कल्चर’ बहुत जरूरी है।
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हालांकि भारत में इसके उलट कहावत मशहूर है- ‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे बनोगे खराब’
‘घंटों बैठता था दफ्तरों के बाहर, किसी ने नहीं की मदद’
गोपीचंद
- फोटो : getty
गोपीचंद साल 2001 में ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन टाइटल जीतने वाले दूसरे भारतीय बने। इसके बाद वो रिटायर हो गए और उन्होंने हैदराबाद में अपनी अकादमी खोली। उन दिनों को याद करते हुए गोपीचंद ने बताया कि कैसे उन्हें आर्थिक मदद नहीं मिली थी।
गोपीचंद ने बताया कि वो तीन दिनो तक दफ्तरों के बाहर बैठे रहे। सुबह 9 से 5.30 तक का लंबा इंतजार करने के बाद उन्हें वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि बैडमिंटन विश्व के खेलों में बड़ी भूमिका नहीं रखता और किसी ने भी उन्हें आर्थिक मदद नहीं दी।
एक सम्मान समारोह में गोपीचंद ने कहा कि वो आखरी दिन था जब वो किसी के पास स्पॉन्सरशिप के लिए मदद मांगने गए। इसके बाद उन्होंने अपना घर गिरवी रखने का फैसला किया और अपनी अकादमी खोली। उन्होंने इसके लिए अपने माता-पिता और पत्नी का शुक्रिया अदा किया।
गोपीचंद ने बताया कि वो तीन दिनो तक दफ्तरों के बाहर बैठे रहे। सुबह 9 से 5.30 तक का लंबा इंतजार करने के बाद उन्हें वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि बैडमिंटन विश्व के खेलों में बड़ी भूमिका नहीं रखता और किसी ने भी उन्हें आर्थिक मदद नहीं दी।
एक सम्मान समारोह में गोपीचंद ने कहा कि वो आखरी दिन था जब वो किसी के पास स्पॉन्सरशिप के लिए मदद मांगने गए। इसके बाद उन्होंने अपना घर गिरवी रखने का फैसला किया और अपनी अकादमी खोली। उन्होंने इसके लिए अपने माता-पिता और पत्नी का शुक्रिया अदा किया।