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तीर्थों की शक्ति में इसलिए कमी आने लगी है!

ज्योतिर्मय Updated Wed, 26 Jun 2013 12:45 PM IST
why mythological place lose own power
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कहीं एकांत में जाकर साधना करें तो बहुत कम संभव है कि कोई विशेष अनुभव हो, लेकिन तीर्थ में करें तो अनुभूति बहुत ज़ोर से होगी। लगेगा कि चैतन्य और ऊर्जावान क्षेत्र में पहुंच गए हैं। इसके दो कारण हैं, एक तो व्यक्ति का अपना ग्रहणशील होना और दूसरे उस क्षेत्र का विशेष तरंगों से भरे रहना।
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महर्षि भावातीत ध्यान केंद्र नैनी में ध्यान सिखाते रहे पं. रामवल्लभ शर्मा ने अठारह तीर्थों का अध्ययन किया और इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि तीर्थ क्षेत्रों में पहुंच कर लोगों की सत्कर्मों में रुचि बढ़ जाती है। जिनके मन में अपने इलाके या दूसरे स्थानों पर कभी कदा जो बुरी इच्छाएं सिर उठाती थी, उन पर भी अंकुश लगता है।

उनका कहना है कि तीर्थों के इस प्रभाव का कारण वहां पिछले कई सौ सालों से चल रही आध्यात्मिक गतिविधियां हैं। महर्षि महेश योगी के टीएम सिद्धि और महर्षि इफेक्ट क्षेत्र के प्रयोग और निष्कर्ष भी इस बात की पुष्टि करते हैं।

इन प्रयोगों के अनुसार विभिन्न साधना परंपराएं उस क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रखती हैं। महर्षि इफेक्ट के वीएस टंडन का कहना है कि 1970 के दशक में भारत के करीब पांच सौ शहरों में यह कार्यक्रम शुरु करने की योजना थी।

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पिछले प्रयोग और परंपरा के निष्कर्ष बताते हैं कि जिन बस्तियों में एक प्रतिशत लोग कायदे से ध्यान करने लगते हैं, वहां सकारात्मक बदलाव आने लगते हैं। बुरे से बुरे व्यक्ति को भी अच्छे काम करने और अपनी प्रवृत्तियों को रोकने की इच्छा होती है।

अमेरिका की दस बस्तियों में छह सप्ताह के ध्यान प्रयोगों में साबित हुआ की उन स्थानों पर अपराधों में बीस प्रतिशत तक गिरावट आई है। काशी, रामेश्वरम और पुरी की परंपराओं के बारे में स्कंद और अग्निपुराण का हवाला देते हुए पं. रामवल्लभ का कहना है कि इन तीर्थों में दो सौ साल पहले तक नियमित रूप से पंद्रह से बीस प्रतिशत लोग ऐसे थे जो स्वाध्याय, तप और ज्ञानदान के अलावा मंदिरों में पूजापाठ की गतिविधियां चलाते थे।

ये पंरपराएं या व्यवस्थाएं अब क्षीण हुई हैं इसलिए तीर्थो का स्वरूप भी बिगड़ा है। जिन जगहों पर जो भले ही तीर्थ से हट कर ही क्यो न हो, साधना-स्वाध्याय की प्रवृत्तियां शुरु हुई वहां वातावरण में उर्जा दिखाई देती है।

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