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तब आंख नाक और त्वचा उलटा पुलटा काम करने लगते हैं
Updated Sun, 24 Nov 2013 02:45 PM IST
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सात रंग या उनसे मिलकर बने विविध रंगों में कई लोगों को चार, पांच या छह अथवा उनसे मिलें रंग ही दिखाई देते हैं। शरीर शास्त्रियों की मानें तो पैंसठ से सत्तर प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिन्हें कलर ब्लाइंडनेस या वर्ण-अंधता की बीमारी है। यानी उन्हें सातों रंग और उनके मेल से बने रंग दिखाई नहीं देते। बीस हजार लोगों में पांच व्यक्ति ऐसे मिल जाएंगे जिन्हें सात मुख्य रंगों में से कोई एक रंग नहीं दिखाई देता।
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यह तथ्य तो शीशे की तरह साफ है। अब तो इस रोग या वर्ण अंधता की विधिवत चिकित्सा भी होने लगी है। इस रोग के बारे में या बारीकियों पर चर्चा कोई नई बात नहीं है। नई बात यह है कि रंगों का या उनकी छटा का कम ज्यादा दिखाई देने की परख अब आंतरिक स्थिति को समझने के लिए भी की जाने लगी है।
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जर्मनी में हेनोवर स्थित योग वेदांत सेंटर के वैज्ञानिक डा. वर्नर हाइजनबर्ग और भारत से गए संयासी स्वामी ईश्वरानंद समर्पण ने कहा है कि आंतरिक स्थिति बहुत अव्यवस्थित हो तो व्यक्ति को रंग दिखाई देने की जगह शोर सुनाई पड़ने लगता है और गंध की जगह कोमल या कठोर स्पर्श का अनुभव होने लगता है।
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कुछ साधकों और सेंटर में नियमित आने वाले सदस्यों के अनुभवों का अध्ययन कर वर्नर और स्वामी समर्पण ने अपने निष्कर्ष स्पिरिचुल साइंस नामक पत्रिका के ताजा अंक में पेश किए हैं। उनके अनुसार व्यक्ति चित्त के स्तर पर अस्त व्यस्त होता है तो नेत्र, स्पर्श और घ्राण अर्थात सूंघने वाली इंद्रियां अपना काम छोड़कर दूसरी इंद्रियों के काम करने लगती है।
विचार और विश्लेषण की इस दिशा में आगे बढ़ते हुए स्वामी समर्पण ने कहा कि इंद्रियों का यह भटकाव ही माया है। भटकाव भी एक शक्ति है। उदाहरण से समझाते हुए उन्होंने कहा कि जादूगर अपनी चतुराई से पदार्थों को विपरीत रूप में दिखाता है, पदार्थों के अभाव में भी उन्हें दिखा देता है। यह उसकी माया है।
डा. बर्नर के अनुसार मन या चित्त एक कोरी स्लेट की तरह है जिस पर बाहर से निरंतर प्रभाव पड़ते रहते हैं। कुछ जानने या अनुभव करने के लिए मन को सक्रिय होना पड़ता है। बाहरी दृश्यों, स्थितियों और घटनाओं का मूलरूप जो भी हों, वे मन या चित्त की गुणग्राही शक्ति के अनुसार ही आकार लेते हैं। यही माया है। मन की इस स्थिति से पार जा कर ही वस्तु स्थिति का भान होता है। भ्रम भटकाव से बचना हो तो आंतरिक संतुलन साधना और चित्त को एकाग्र करना चाहिए।