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हमारा ब्रह्माण्ड सात वर्ष का शिशु
ज्योतिर्मय
Updated Fri, 22 Mar 2013 11:50 AM IST
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समय-समय पर प्रलय और दुनिया खत्म होने की ख़बर आती रहती है। लेकिन सच यह है दुनिया अभी खत्म होने वाली नहीं हैं। हमारा ब्रह्माण्ड तो अभी पूरी तरह से युवा भी नहीं हुआ है। ब्रह्माण्ड के जन्म लेने, बनने या विकसित होने और उसके आँगन को जीवन के खिलने योग्य बनने की अवधि अभी पांच अरब वर्ष ही बीती है।
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यह अवधि सूर्य के कुल जीवन अवधि का दस प्रतिशत ही है। मनुष्य के जिंदगी को आधार बनाकर सोचें तो ब्रह्माण्ड अभी सात वर्ष का शिशु ही है। अध्यात्म विद्या के अनुसार सूर्य की आयु 4 लाख 32 हजार करोड वर्ष है। इसे पुराणों की भाषा में कल्प कहते है। अब खगोल विज्ञानी भी मानने लगे हैं कि कम से कम इतने समय तक सूर्य जवान बना और अपनी ऊर्जा बिखेरता रहता है।
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कार्ल सेमुअल ने अपनी पुस्तक- कास्मोस- में इन गणनाओं की विज्ञान से संगति बिठाते हुए कहा है कि युगों के अवधारणा से दुनिया के नष्ट होने की बात बहुत मेल खाती है। अपना सूर्य पांच अरब वर्ष पहले जन्मा था। अभी वह जवान ही है। कम से कम इतने ही समय तक वह और प्रखर बना रह सकेगा। वैज्ञानिकों के अनुसार उसकी आरंभिक हाइड्रोजन संपदा का दस प्रतिशत हिस्सा ही हीलियम राख के रूप में परिणत हुआ है।
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उसके वृद्ध होने में अभी पांच अरब वर्ष वर्ष का समय और लगेगा। तब तक वह इतना ईधन खर्च कर देगा कि उसका आकार उस खालीपन के कारण तीस गुना बढ़ जाएगा। याद रहे कि नक्षत्र विज्ञान के अनुसार तारे जब अपनी ऊर्जा गंवाते है तो वे धुनी हुई रूई की तरह फूलने लगते है। एक हद तक फूलते रहने के बाद वे सिकुड़ने लगते और मर कर ब्लैक होल में बदल जाते है।
सूर्य को उस स्थिति में पहुंचने के लिए अभी अरबों वर्ष चाहिए। इसलिए सर्वग्रासी प्रलय से डरने की जरूरत नहीं है, न अध्यात्मिक दृष्टि से और न विज्ञान की दृष्टि से। कुछ विद्वानों ने तो यहां तक लिखना शुरु कर दिया कि ग्लोबल वार्मिंग जैसे जुमलों से भी डरने की जरूरत नहीं है। पृथ्वी और सौर मंडल के इतिहास में इस तरह के परिवर्तन तो होते ही रहते है। जिन बदलावों का असर दिखाई देता है, उनकी तुलना में नहीं दिखाई देने वाले बदलाव ज्यादा बड़े है।