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जानें नवरात्र व्रत का वैज्ञानिक आधार

Thu, 11 Apr 2013 12:06 PM IST
ज्योतिर्मय
ज्योतिर्मय Updated Thu, 11 Apr 2013 12:06 PM IST
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navratri vrat scientific fact

मन मस्तिष्क और चेतना के क्षेत्र में आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो योग का जो भी असर होता हो, वह शरीर को जरूर स्वस्थ बना देता है। यह कोई नया तथ्य नहीं है लेकिन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो साइंस के डॉ जी एस बर्नी का कहना है कि अभ्यास के साथ समय का भी बहुत महत्व है।

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पूरे साल जो अभ्यास किए जाते हैं, उनकी तुलना में आश्विन और चैत्र के महीनों में इन अभ्यासों का ज्यादा प्रभाव देखा गया है। वजह यह बताई है कि इन महीनों में तेईस तारीख को दिन और रात बराबर होते हैं। डॉ बर्नी इस प्रतिपादन से भी एक कदम आगे कहते हैं कि अभ्यास अगर नए चंद्रमा के हिसाब से शुरू किया जाए तो शरीर ही नहीं मन भी प्रभावित होता है।
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उनका ध्यान शायद इस बात पर नहीं गया कि आश्विन और चैत्र के उजले पखवाड़े की पहली तिथि को ही नवरात्र शुरू होते हैं। इन नौ दिनों में पूजा पाठ जप तप, उपवास आदि का सिलसिला धर्म कर्म से जोड़ा गया है। प्रो. गेराल्ड के अनुसार भारत ही नहीं दुनिया भर में इन तारीखों में कुदरत अपने रंग बदलती है।
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भारत में उस बदलाव से तालमेल बिठाने के लिए शरीर और मन को साधने का एक व्यवस्थित अभ्यास तय किया गया। आहार व्यवहार का संयम और जप ध्यान इसी निर्धारण का हिस्सा है। खगोल विज्ञानियों के अनुसार 23 सितंबर से दिन रात बारह बारह घंटे के हो गए।

दक्षिणी गोलार्ध में प्रवेश करने के कारण सूर्य लंबवत चमकने लगा और रातें बड़ी होने लगीं। उत्तरी गोलार्ध में उसकी किरणें तिरछी जा रही है। इसलिए वहां सर्दी महसूस होने लगी। तीन महीने बाद यानी 22 दिसंबर को रात सबसे बड़ी (करीब तेरह घंटे) होगी और सर्दी सबसे ज्यादा।


प्रो गेराल्ड के अनुसार जिन लोगों या ऋषियों ने यह चक्र शुरू होने से पहले नौ दिन का एक अभ्यास क्रम किया वे वाकई आइंस्टीन और न्यूटन की प्रतिभा के लोग होंगे। शायद उनसे भी ज्यादा, क्योंकि उन्होंने यह सारा निर्धारण निश्चित ही बिना उपकरणों या प्रयोगशाला के जरिए किया होगा।

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