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मंत्र सिद्घ होते ही प्रकट होने लगते हैं यह लक्षण

Sat, 01 Jun 2013 12:06 PM IST
ज्योतिर्मय
ज्योतिर्मय Updated Sat, 01 Jun 2013 12:06 PM IST
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mantra siddhi indication
जब मंत्र, साधक के भ्रूमध्य या आज्ञा-चक्र में अग्नि- अक्षरों में लिखा दिखाई दे, तो मंत्र-सिद्ध हुआ समझाना चाहिए। यह बात किसी साधु महात्मा या धार्मिक प्रवचन करने वाले व्यक्ति द्वारा नहीं कही गिया है। पुणे के अंतरिक्ष अनुसन्धान केंद्र में शोध कर रहे डा. एस नारायण ने कही है।
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अंतरिक्ष यात्रा की तैयारी कर रहे शोधार्थियों पर प्रयोगों के दौरान उन्हें लगा कि यात्रा के समय आवश्यक मनोबल बनाए रखने में मंत्र जप सहयोगी हो सकता है। इस विचार के बाद मंत्रशक्ति पर अनुसंधान शुरू किया तो पाया कि जप में चित्त की एकाग्रता ही सफलता की गारंटी है।
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डा.नारायण के अनुसार मंत्र का सीधा सम्बन्ध ध्वनि से है। ध्वनि प्रकाश, ताप, अणु-शक्ति, विधुत -शक्ति की भांति एक प्रत्यक्ष शक्ति है। मन्त्रों में नियत अक्षरों का एक खास क्रम, लय और आवर्तिता से उपयोग होता है। इसमें प्रयुक्त शब्द का निश्चित भार, रूप, आकार, शक्ति, गुण और रंग होता हैं। एक निश्चित उर्जा, फ्रिक्वेन्सि और वेवलेंथ होती हैं।
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डा. नारायण के अनुसार इन बारीकियों का धयान रखा जाए तो मंत्रों की मिट्टी से बनायी गई आकृति से भी उसी तरह की ध्वनी आती है। उदाहरण के लिए गीली मिट्टी से ॐ की पोली आकृति बनाई जाए और उसके एक सिरे पर फूंक मारी जाए तो ॐ की ध्वनि स्पष्ट सुनाई देती है जैसे पास ही कोई ओम मन्त्र का उच्चारण कर रहा हो। जप के दौरान उत्पन्न होने वाली ध्वनि एक कम्पन लाती है।

उस से सूक्ष्म ऊर्जा-गुच्छ पैदा होते है और वे ही घनीभूत होकर मन्त्र को सफल बनाते हैं। सफलता की उस प्रक्रिया पर ज्यादा कुछ कहना जल्दबाजी होग। सिर्फ उन की सफलता के लक्षणों की बारे में बताया जा सकता है। सफलता के जो लक्षण हैं उनमें कुछ इस प्रकार है। जब बिना जाप किये साधक को लगे की मंत्र-जाप स्वतः चल रहा हैं तो मंत्र की सिद्धि होनी अभिष्ट हैं।


साधक सदैव अपने इष्ट -देव की उपस्थिति अनुभव करे और उनके दिव्य-गुणों से अपने को भरा समझे तो मंत्र-सिद्ध हुआ जाने। शुद्धता, पवित्रता और चेतना का उर्ध्गमन का अनुभव करे, तो मंत्र-सिद्ध हुआ जानें मंत्र सिद्धि के पश्चात साधक की शुभ और सात्विक इच्छाए पूरी होने लगती हैं।
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