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जल की समस्या का कारण आदर भाव की कमी

Thu, 30 May 2013 11:55 AM IST
ज्योतिर्मय
ज्योतिर्मय Updated Thu, 30 May 2013 11:55 AM IST
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lack in respect is reason of water shortage problem

ब्रह्मपुराण के हवाले से काशी के पंडित विष्णुकांत शर्मा ने कहा है कि अगले दिनों कितनी ही समृद्धि बढे पर भरण पोषण की समस्या भीषण रुप लेने वाली है। लोगों के पास पैसा होगा, खाने पीने की अप्राकृतिक वस्तुएँ भी बहुत हो सकती है पर भूख प्यास फिर भी बेतहाशा बढ़ेगी।

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उनका कहना है कि जल विष्णु का निवास स्थान है या जल ही उनका स्वरूप है। वही ‘जल‘ के स्वामी भी हैं। उनका वास, स्वरूप और अधीन संपदा से ही खिलवाड़ हो रहा है तो पोषण संवर्धन की स्थितियां कैसे ठीक ठाक रहेगी। शास्त्री जी के इस वक्तव्य को पोंगापंथी कह कर यूं ही मत उड़ाइए।
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जल के नैसर्गिक स्वरूप और उसकी शुद्धता कायम रखने के लिए काम कर रहे ओंकारेश्वर के संस्थान वरुण में नर्मदा के पानी पर शोध के बाद कहा है कि जल की प्रचुरता तो जरूरी है ही उसके प्रति अनुग्रह और प्रसाद का भाव होना भी जरूरी है। जल का शुद्ध होना तो जरूरी है ही उससे ज्यादा उसमें पूज्य भाव जरूरी है।
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वरुण के निदेशक डा. अनिल पाटीदार ने शोध, अनुसंधान और उसके निष्कर्षों के साथ कहा है कि जल के प्रति यह पूज्यभाव जिन दिनों था, उन दिनों नदियों और तालाबों के जल को सोच समझ कर उपयोग किया जाता था। दस बारह लीटर पानी में लोग घर पर ही स्नान कर लेते थे। नदी तालाबों  में स्नान करने पर तो इतना पानी भी नहीं लगता था।

 
तीर्थों के जल में जहां बड़ी संख्या में लोग स्नान करते थे, कपड़े धोने पर मनाही थी। लोग पूर्णतया नदी में सीधे नहीं उतरते थे। पहले आचमन और प्रसेचन करते थे। इसलिए जल की पवित्रता बनी रहती थी। पुण्यभाव से किए गए उस सेवन और बेरहमी से किए जा रहे आज के उपयोग से जल या वरुण का दूषित या कुपित होना स्वाभाविक ही है।

बेहतर होगा की पानी की फिजूलखर्ची रोकने के लिए जल के प्रति अहोभाव और धन्यता का बोध जगाया जाए।

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