फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Spirituality ›   Yog-Dhyan ›   is ganga not present on earth

क्या सचमुच भागीरथी धरती से वापस चली गई?

Tue, 18 Jun 2013 08:28 AM IST
ज्योतिर्मय
ज्योतिर्मय Updated Tue, 18 Jun 2013 08:28 AM IST
विज्ञापन
is ganga not present on earth

कलियुग के पाँच हजार साल बीतने पर गंगा भी पृथ्वी से चली जाएगी। - देवी भागवत पुराण (स्कंध 9, अध्याय 11)

विज्ञापन

देवी भागवत पुराण के अनुसार भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर विष्णु ने गंगा को पृथ्वी पर जाने के लिए कहा तो गंगा ने भगवान विष्णु से अपनी आज्ञा वापस लेने की प्रार्थना की।

वह विष्णु के चरणों में ही रहना चाहती थी। बहुत अनुनय-विनय करने के बाद विष्णु इस बात के लिए राजी हुए कि सगरपुत्रों का उद्धार करने के बाद कालांतर में वह वापस आ जाए। इसके लिए कलियुग के पांच हचार साल तय किए गए।
विज्ञापन


विष्णु के इस आश्वासन की व्याख्या करते हुए कथाकार कहते हैं कि वे पांच हजार साल तो बीत गए। कलगणना के अनुसार कलियुग आरंभ हुए 5115 वर्ष हो गए। और उपरोक्त आश्वासन के अनुसार गंगा पृथ्वी से वापस भी चली गई
विज्ञापन
विज्ञापन


अब कहां है वह गंगा जिसका पानी कई कई साल तक खराब नहीं होता था और जिसे कई जटिल रोगों के उपचार में काम लिया जाता था। यह पौराणिक प्रतीक सीधे सपाट ढंग से भी सामने दिखाई दे रहा है।

जलवायु परिवर्तन पर तैयार की गई एक अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की दस बड़ी नदियां सन् 2040 तक सूख जाएंगी। इन नदियों में मिस्र की नील, चीन की यांगत्सी, मेकाम और ब्रिटेन की टेम्स नदियां भी हैं।

आखिर क्या है गंगा में जो नील, यांगत्सी और टेम्स आदि नदियों में नहीं है। ये नदियां प्रदूषण रहित होते हुए भी गंगा की तरह लोगों के जीवन-मरण का हिस्सा नहीं हैं। एक विशेषता जो पुरानी पीढ़ी के लोग बताते रहे हैं, अब लुप्त हो चुकी है।

विशेषता यह कि गंगा का पानी कभी खराब नहीं होता। यह सिर्फ किंवदंती नहीं है। 1960-65 तक भारत के गाँव-कस्बों में यह दावा करने वाले लोग बड़ी संख्या में मिल जाते थे कि गंगा का पानी हमेशा पवित्र रहता है।

इस पुण्य नदी से भरकर लाए गए जल को लोग दीवारों में चिनवाकर या छत पर कहीं ऐसी जगह सुरक्षित रखते थे जहाँ कोई छू न सके और कहते हैं कि वह पानी बरसों बरस ज्यों का त्यों मिलता था।

पुराणों में इस संभावना को गंगा के लिए विष्णु की दी हुई छूट के रूप मे बताया गया है। कहा गया है कि कलियुग में पाप, अन्याय, अत्याचार और अधर्म इस कदर बढ़ जाएंगे कि किसी भी दैवीय रचना का अस्तित्व बनाए रखना मुश्किल होगा।


लेकिन पौराणिक मान्यताओं का आधुनिक दृष्टि से विवेचन करने वाले विद्वान इस पंक्ति को पर्यावरण और औद्योगिक प्रदूषण से जोड़ते हुए कहते हैं। प्रकृति के किसी भी नियम या मर्यादा का उल्लंघन अधर्म है, पाप है। तो प्रदूषण फैलाने और पर्यावरण संतुलन बिगाड़ने के तौर पर आधुनिक सभ्यता उस अधर्म को जोर-शोर से कर रही है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed