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सर्दी जुकाम आए तो समझिए सफलता मिलने वाली है
अमर उजाला, दिल्ली
Updated Tue, 15 Oct 2013 09:14 AM IST
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अगर रोग शोक और दुख व्यक्ति को निराश करते हैं, थकाते हैं और फिर कामयाबी के रास्ते में रोड़े अटकाते हैं तो यह भी हो सकता है कि इन रोड़ों को सीढ़ियां बना लिया जाए और शिखर पर पहुंचा जाए। नार्मन कजिन्स नाम के मनोविज्ञानी और शरीर शास्त्री ने तेरह साल तक दु:खी, निराश और हीरो से जीरो बने लोगों के साथ सामान्य से असाधारण हुए लोगों का अध्ययन करने के बाद यह बात लिखी है।
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दु:खी निराश और ऊंचाई से नीचे गिरे लोगों के बारे में उन्होने कहा है कि ये सभी लोग लगातार नाकाम रहने के कारण दु:खी और परेशान नहीं हुए बल्कि बहुत लोग तो अचानक निराश रहने लगे थे और उनकी नकारात्मक भावनाओं के कारण वे एक के बाद एक लगातार असफल रहने लगे थे। अपने अध्ययन और निष्कर्षों को - द बायोलॉजी आफ होप एंड द हीलिंग पावर आफ द ह्यूमन स्पीरिट- में लिखते हुए उन्होंने बताया है कि सकारात्मक विचार मनुष्य को किस तरह मजबूत बनाते हैं।
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सकारात्मक विचारों और भावनाओं में आशा और उत्कंठा जादू की तरह काम करती है। कजिन्स ने अपने अध्ययन में लिखा है कि आशा और विश्वास बटोर कर खड़े होते ही स्नायु संस्थान अचानक सक्रिय हो उठते हैं। इस सक्रियता के बढ़ते ही मस्तिष्क में चलने वाली विद्युत रसायन संचार (इलेक्ट्रोंकेमिकल कनेक्शन) साठ से सत्तर प्रतिशत तक स्वस्थ और सुदृढ़ हो उठती है। पहले क्रम में शारीरिक और मानसिक प्रतिरक्षा प्रणाली सुचारू काम करने लगती है।
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इसके मजबूत होते ही व्यक्ति में पहले तो सरदी, जुकाम खांसी आदि छोटी-मोटी शारीरिक समस्याओं से जूझने की क्षमता आती है। व्यक्ति रोगों से स्वयं अपना बचाव करता है और फिर अवसाद, निराशा, कुंठा और आक्रामकता आदि से उसी तरह छुटकारा मिलने लगता है जैसें सांप को केंचुल से। कजिन्स का कहना है कि आशा और उत्साह का स्रोत अपने आसपास की दुनिया के बजाय किसी अज्ञात आलंबन में निहित है। और वह आलंबन ईश्वर से बड़ा कोई नहीं है।