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इसलिए भी बने और बचे रहते है देवस्थान
ज्योतिर्मय
Updated Sat, 22 Jun 2013 11:46 AM IST
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जिन मंदिरों या देवस्थानों पर आश्चर्यजनक रूप से शांति और ऊर्जा मिलती है, उसकी वजह सूर्य से एक खास सामंजस्य बना होना है। पृथ्वी पर चलने वाली चुंबकीय धाराएं और साधकों के आचार विचार, रहन सहन, ध्यान पूजा की आध्यात्मिक गतिविधियां भी मंदिरों के जीवन और जीवंत स्थिति को बनाए रखती है।
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भारत के दस बड़े मंदिरों की व्यवस्था और शिल्प का अध्ययन कर रामकृष्ण मिशन के स्वामी सरस्वत्यानंद ने कहा है कि जिन मंदिरों में वास्तुकला का विशेष ध्यान रखा गया है और उस स्थान का चयन आकाशीय ग्रह-नक्षत्रों की गति तथा मौसम के अनुसार किया जाता है, वहां चमत्कार लगने वाली घटनाएं होती हैं। उनके अनुसार चयन और दिशा ज्ञान का भी ध्यान रखा गया है।
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उनके अनुसार उज्जैन और ओंकारेश्वर के मंदिर कर्क रेखा के ठीक नीचे स्थित हैं। बावन शक्तिपीठ और बारह ज्योतिर्लिंगों की स्थापना के समय भी ग्रह नक्षत्रों के संबंध में भी पृथ्वी पर खींची गई रेखाओं का तो इतना ध्यान नहीं रखा गया पर वास्तु के अधिकांश नियमों का पालन किया गया। मंदिरों में ऊर्जा बनाए रखने के लिए उनके शिखर का भी महत्व है।
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विधि व्यवस्था के अनुसार बने मंदिरों में ज्यादातर गुंबद और मंडप आकार के हैं। जो इस तरह के नहीं हैं वे कुछ-कुछ पिरामिडनुमा आकार के हैं। स्वामी सरस्वत्यानंद के अनुसार ऋषि-मुनियों की कुटिया भी उसी आकार की होती थी। पुराने मकानों की छतें भी कुछ इसी तरह की होती थी।
बाद में रोमन, चीन, अरब और युनानी वास्तुकला के प्रभाव के चलते मंदिरों के वास्तु में परिवर्तन होता रहा। जो मंदिर पिरामिडनुमा होते हैं वे पूर्व, उत्तर या ईशानमुखी होता है। तीन चार दिन पहले उत्तराखंड में आए जल-प्रलय भूस्खलन के कारण मची सर्वग्राही तबाही के दौरान भी केदारनाथ मंदिर का अस्तित्व बचा रहा तो, उसकी वजह वहां किए गए आध्यात्मिक उपचार और वास्तु ही है। विद्वान इस आधार पर मंदिरों और देवस्थानों को सूर्य देवता के दैवीय अंश सविता से सामंजस्य से जोड़ कर देखते हैं।