{"_id":"79bb9962-a194-11e2-a0ba-d4ae52bc57c2","slug":"be-responsible-donation-is-not-enough","type":"story","status":"publish","title_hn":"दान से काम नहीं चलेगा, जिम्मेदार भी बनना होगा ","category":{"title":"Yog-Dhyan","title_hn":"योग-ध्यान","slug":"yoga"}}
दान से काम नहीं चलेगा, जिम्मेदार भी बनना होगा
ज्योतिर्मय
Updated Wed, 10 Apr 2013 09:39 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उद्योगपतियों की जनहितकारी
विज्ञापन
और परोपकारी गतिविधियों को विद्वानों ने एक विशिष्ट नाम दिया है- कारपोरेट सोशल
रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर)। इन शब्दों का अर्थ केवल इन धनी व्यक्तियों द्वारा दिये
गये धन के दान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी कल्पना काफी व्यापक है।
पीपुल, प्लांट और प्राफिट यानी जन, धरती और लाभ पर केंद्रित इस प्रवृत्ति को कुछ धार्मिक विद्वानों ने दान की राशि को अध्यात्म के लिहाज से खास नहीं माना है।
उनके अनुसार किसी राह चलते साधारण व्यक्ति का दिया एक रूपए का दान किसी करोड़पति के दिए लाख रूपयों की तुलना में ज्यादा पुण्यदायी हो सकती है बशर्ते कि दी गई राशि के प्रति कोई लगाव या देने का अंहकार न हो। रामकथा के प्रसिद्ध वक्ता मोरारी बापू के अनुसार आध्यात्मिक क्षेत्र में कृत्य की मात्रा के बजाय उसके पीछे छुपी भावना का महत्व होता है।
रामायण में सेतुबंध के समय हनुमान, जांबवंत, सुग्रीव, नल-नील आदि रीछ वानर वीरों के योगदान का जितना महत्व था, समुद्र में डूबकी लगा कर आने और रेत में लोट लगा कर वापस समुद्र में डूबकी लगाने वाली गिलहरी का महत्व भी कम नहीं था। बल्कि राम अर्थात ईश्वरीय चेतना ने गिलहरी को ज्यादा महत्व दिया। गिलहरी के शरीर पर खींची धारियां इसका प्रमाण हैं।
बहरहाल सामाजिक जिम्मेदारी के नाते दिए जाने वाला दान का भी महत्व है। सीसीआरए के तहत दिए जाने वाले विपुल दान की कुछ मर्यादाएं शायद इसीलिए जुड़ी हैं। जैसे सीसीआर से जुड़े उद्योग को यह मर्यादा भी निभाना पड़ेगी जैसे बाल श्रम का उपयोग एवं शोषण नहीं किया जायेगा, श्रमिकों को उचित वेतन मिलेगा, काम के घंटे बहुत लम्बे नहीं होंगे और किसी भी तरह से श्रमिकों का शोषण नहीं होगा।
धरती (प्लांट) का अर्थ प्राकृतिक सम्पदा से है। ऐसी कंपनियां विषैली वस्तुओं का उत्पादन नहीं करेंगी, ऐसा कोई काम नहीं करेंगी, जिससे पर्यावरण दूषित हो। लाभ कमाना हर उद्योग का मूल उद्देश्य है किन्तु यह लाभ अनुचित एवं अनैतिक तरीके अपनाकर नहीं कमाया जायेगा।
पीपुल, प्लांट और प्राफिट यानी जन, धरती और लाभ पर केंद्रित इस प्रवृत्ति को कुछ धार्मिक विद्वानों ने दान की राशि को अध्यात्म के लिहाज से खास नहीं माना है।
उनके अनुसार किसी राह चलते साधारण व्यक्ति का दिया एक रूपए का दान किसी करोड़पति के दिए लाख रूपयों की तुलना में ज्यादा पुण्यदायी हो सकती है बशर्ते कि दी गई राशि के प्रति कोई लगाव या देने का अंहकार न हो। रामकथा के प्रसिद्ध वक्ता मोरारी बापू के अनुसार आध्यात्मिक क्षेत्र में कृत्य की मात्रा के बजाय उसके पीछे छुपी भावना का महत्व होता है।
रामायण में सेतुबंध के समय हनुमान, जांबवंत, सुग्रीव, नल-नील आदि रीछ वानर वीरों के योगदान का जितना महत्व था, समुद्र में डूबकी लगा कर आने और रेत में लोट लगा कर वापस समुद्र में डूबकी लगाने वाली गिलहरी का महत्व भी कम नहीं था। बल्कि राम अर्थात ईश्वरीय चेतना ने गिलहरी को ज्यादा महत्व दिया। गिलहरी के शरीर पर खींची धारियां इसका प्रमाण हैं।
बहरहाल सामाजिक जिम्मेदारी के नाते दिए जाने वाला दान का भी महत्व है। सीसीआरए के तहत दिए जाने वाले विपुल दान की कुछ मर्यादाएं शायद इसीलिए जुड़ी हैं। जैसे सीसीआर से जुड़े उद्योग को यह मर्यादा भी निभाना पड़ेगी जैसे बाल श्रम का उपयोग एवं शोषण नहीं किया जायेगा, श्रमिकों को उचित वेतन मिलेगा, काम के घंटे बहुत लम्बे नहीं होंगे और किसी भी तरह से श्रमिकों का शोषण नहीं होगा।
धरती (प्लांट) का अर्थ प्राकृतिक सम्पदा से है। ऐसी कंपनियां विषैली वस्तुओं का उत्पादन नहीं करेंगी, ऐसा कोई काम नहीं करेंगी, जिससे पर्यावरण दूषित हो। लाभ कमाना हर उद्योग का मूल उद्देश्य है किन्तु यह लाभ अनुचित एवं अनैतिक तरीके अपनाकर नहीं कमाया जायेगा।