सीख: काम चलाऊ काम का नतीजा हमेशा होता है खराब
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जिम कोई काम नहीं करता था, बस दिन भर घर में बैठकर मोबाइल पर गेम खेला करता था। जिम के पिता सेनाधिकारी थे, जो रिटायर होने के बाद ज्यादातर घर में रहते थे और रोजी-रोटी के लिए थोड़ा बहुत काम किया करते थे। एक दिन अचानक वह अपने बेटे से बोले, घर के पीछे वह जो खाली जमीन है, उस पर एक नया घर बनाना है। तुम्हें क्या-क्या सामान चाहिए, मुझे बता दो। जिम हक्का-बक्का होकर अपने पिता को देखने लगा। फिर बोला, पर नए घर की क्या जरूरत है? और घर बनाने के लिए हम किसी मजदूर को क्यों नहीं बुला लेते? मुझे घर बनाना नहीं आता।
जिम के पिता बोले, घर तो तुम्हें ही बनाना होगा, क्योंकि मजदूर को देने के लिए मेरे पास पैसे नहीं। और मेरे पास इतना वक्त भी नहीं कि मैं घर बनाने में तुम्हारी मदद करूं। जिम के पास कोई चारा नहीं था। रोज सुबह पिता उसे उठाकर घर बनाने के काम में लगा देते थे। जिम का काम में मन नहीं लगता था। पर पिता के डर से वह थोड़ा काम करता दिखाई देता रहता था। कभी लकड़ी काटता था, तो कभी कागज पर घर की नई डिजाइन बनाता था। धीरे-धीरे छह महीने गुजर गए।
जिम ने न चाहते हुए भी घर का एक ढांचा तो तैयार कर ही दिया था। बाहर से सब अच्छा ही दिखता था, पर घर की बुनियाद बहुत कमजोर थी और जिम यह बात अच्छे से जानता था। लेकिन उसे तो लगता था कि यह घर किसी को बेच दिया जाएगा। बाहर के सुंदर दिखावे से घर की अच्छी कीमत भी मिल जाएगी। फिर आगे घर चले, न चले, यह घर खरीदने वाले की किस्मत। कुछ दिनें में जब घर बनकर तैयार हो गया, तो जिम के पिता बोले, मुझे तुम्हारे ऊपर गर्व है कि तुमने अपनी मेहनत से घर तैयार किया है। यह घर आज से तुम्हारा हुआ और अब तुम इसी में रहोगे। यह सुनकर जिम की हालत खराब हो गई, क्योंकि उसे पता था कि वह घर रहने लायक नहीं है। उसने अपने पिता से बहुत विनती की कि वह ऐसा न करें। लेकिन पिता ने उसकी एक न सुनी।