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अतिथि के आने पर क्यों खुश होना चाहिए?

Mon, 22 Sep 2014 10:45 AM IST
सुधांशु जी महाराज/ अध्यात्मिक गुरु
सुधांशु जी महाराज/ अध्यात्मिक गुरु Updated Mon, 22 Sep 2014 10:45 AM IST
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sudhanshu ji maharaj pravachan on guest in our culture

ऐब सिखाए वह आपका सगा नहीं हो सकता है। हां जो आपके ऐब मिटाए वह भले ही कितना भी कड़वा बोले वही आपका सगा होता है और आपका सच्चा मित्र भी वही होगा। खून के रिश्ते अपना होने की पहचान नहीं है, किसी का अपना होना तो कर्मों पर निर्भर करता है।

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हमारे सब हैं जैसे ईश्वर सबके हैं और सब ईश्वर के। बेहतर होगा कि आप घरों में रहने के साथ-साथ लोगों के दिलों में भी रहें और बिना आपसी प्रेम के यह संभव नहीं है।
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'अतिथि देवो भवः' संस्कृत की ये पंक्ति हमारी संस्कृति है। जिसे आजकल लोग बोझ समझने लगे हैं। यहां बदलाव की जरूरत है, या यूं कहें की अतिथि सत्कार में हमें पीछे मुड़ कर वहीं रुक जाना चाहिए। अतिथि आता है और जाता है। जब अथिति जाता है तो अपने साथ पाप भी ले जाता है और पुण्य दे जाता है। ध्यान रखो, मेहमान का आदर करो। हमारे संस्कार भी यही हैं और सत्य भी यही है।
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हमारे जीवन का स्वर्णिम कल आज पर निर्भर करता है। भविष्य को उज्जवल करने की आकांक्षा यदि हमारे मन में है तो आज को संवारना होगा। आज हमने जो बोया है, कल वही हम काटेंगे।


सुधांशु जी महाराज

सुधांशु जी महाराज का जन्म 2 मई 1955 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुआ। इन्होंने गायत्री मंत्र द्वारा अज्ञानता दूर करने का हुनर सीखा। सुधांशु जी महाराज आध्यात्मिक शिक्षा के प्रचारक हैं। दिल्ली में इनका मुख्य आश्रम है। इनके आश्रम को आनंद धाम आश्रम के नाम से जाना जाता है।

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