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परिवार में आपसी तालमेल और प्रेम की कमी का कारण

Mon, 25 Aug 2014 03:12 PM IST
सुधांशु जी महाराज/ अध्यात्मिक गुरु
सुधांशु जी महाराज/ अध्यात्मिक गुरु Updated Mon, 25 Aug 2014 03:12 PM IST
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sudhanshu ji maharaj pravachan on family and society

किसी भी क्षेत्र में चाहे घर-परिवार हो, समाज या राष्ट्र हो हर जगह तालमेल की जरूरत होती है। यदि आपस में तालमेल बैठाना आ गया तो जीवन खुशियों से भर जाएगा। यह तालमेल की स्थिति तभी बन पाती है जब इंसान के अन्दर सद्गुण और अच्छे संस्कार होते हैं।यदि वह शुभ संस्कारों में संस्कारित नहीं हुआ तो उसकी सभी जगह तू-तू मैं-मैं होती रहेगी और इसी में वह अपने जीवन का अमूल्य समय व्यर्थ गंवा देगा। इसलिए जरूरी है कि इंसान में सद्गुणों और शुभ संस्कारों के बीज डाले जाएं।

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सुसंस्कारों के अभाव में कई अच्छे पढ़े-लिखे लोग भी नासमझी का काम कर जाते हैं। वहीं यदि जन्म से ही किसी में अच्छे संस्कार दिए गएए उनका पारिवारिक वातावरण अच्छा रहा तो उन पर अपने माता.पिता व अन्य संबंधियों के सदाचरण की ऐसी छाप पड़ती है कि वे कम पढ़े-लिखे होकर भी समाज में सम्मान के अधिकारी बन जाते हैं और समाज उनकी प्रशंसा के गीत गाता है। उन्हें सभ्यए शिष्ट और संस्कारवान कहा जाता है।
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उनके अन्तर्मन में पड़े अच्छे संस्कारों की वजह से वे वैर-विरोध, कलह-द्वेष से दूर रहकर प्रेमपूर्ण आदर्श समाज के निर्माता बन जाते हैं। वे आपस में बहुत प्रेम से रहते हैं। उनके पास बहुत पैसा नहीं है, लेकिन खुशियां बहुत हैं। मकान बहुत छोटा सा है लेकिन उसमें रहने वालों का हृदय बहुत विशाल है। वे छोटे से घर में ही बड़े प्रेम से रहते हैं, क्योंकि उन्हें जीना आता है, एक-दूसरे के साथ चलना आता है। उनके सम्बन्ध में रिश्तों में मिठास है। वे बहुत ही प्रेम, सद्भाव और सौहार्द से रहते हैं। उनके परस्पर प्रेम, स्नेह व सहयोग की भावना को देखकर अन्य लोग भी सीख लेते हैं। ये सभी बातें उनको दिये गए संस्कारों का ही सुपरिणाम है।
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आज के हिसाब से जो लोग पढ़ रहे हैं, चाहे वह कान्वेंट की पढ़ाई हो या विदेशी स्कूलों की पढ़ाई, जो भी आधुनिक युग के रहने वाले लोग हैं वे भी इस बात को पूरे मन से स्वीकार करते हैं कि पुराने लोगों की बातों में ज्यादा दम था। क्योंकि तब शिक्षा के साथ संस्कारों पर बल दिया जाता था। सामान्य शिक्षा के साथ व्यवहारिक और नैतिक शिक्षा दी जाती थी। उसे नैतिक मूल्यों से अवगत कराया जाता था। जिससे विद्यालय में पढ़ने वाले छात्रा का चहुंमुखी विकास होता था। एक बार वह पढ़ाई में भले ही कमजोर पड़ जाए, लेकिन सामाजिक आचार-विचार, रहन-सहन व शिष्टाचार में हमेशा अव्वल रहता था।

शुभ संस्कारों से उनकी नींव मजबूत होने के कारण वे एक-दूसरे को मान-सम्मान देते थे। एक-दूसरे पर समर्पित थे। पहले यही सिखाया जाता था कि अपना सुख न देखकर दूसरों के लिए सुख पहुंचाने की कोशिश करो। इसीलिए लोग घर-गृहस्थी एवं समाज में सुखी थे। घर-परिवार में एक-दूसरे को सम्मान देने की भावना थी। लोग जैसे अपने लिए चाहते थे वैसा दूसरों से व्यवहार बर्ताव करते थे। सभी सदस्य प्रेम, सौहार्द और सहयोग की डोर में बंधे रहते थे। उनके पारस्परिक संबंधों में मिठास थी। इस सद्भावपूर्ण वातावरण के निर्माण में सुसंस्कारों की अहम भूमिका थी।


लेकिन आज अपनी-अपनी मैं और खुद को विशेष महत्व देने और पाने की लालसा में संबंध में खटास आ रही है। खुद अव्यवस्थित हैं किन्तु दूसरों को व्यवस्थित करने की तालीम देते हैं। गलतियां खुद करेंगे और डांट-फटकार दूसरों को दिखाएंगे। बात-बात पर गुस्सा करेंगे। बिना मतलब एक-दूसरे को नीचा दिखाने की सोचेंगे। जिससे स्वयं परेशान रहकर अन्य लोगों को भी परेशानी में डालते हैं।

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