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Hindi News ›   Spirituality ›   Wellness ›   Sant Kabir Jayanti 2025 Date Life Spiritual Wisdom of Kabir

Sant Kabir Jayanti 2025: 11 जून को संत कबीर जयंती, इनके विचार और दोहों में छिपा गूढ़ ज्ञान

Tue, 10 Jun 2025 01:54 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Tue, 10 Jun 2025 01:54 PM IST
सार

वर्ष 2025 में कबीर जयंती 11 जून को मनाई जाएगी। इस दिन संत कबीरदास की स्मृति में सत्संग, भजन, कीर्तन और उनके उपदेशों का पाठ किया जाता है।

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Sant Kabir Jayanti 2025 Date Life Spiritual Wisdom of Kabir
कबीर जयंती 2025 - फोटो : adobe

विस्तार

Sant Kabir Jayanti 2025: संत कबीर जयंती हर वर्ष ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। यह तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार होती है, जो आमतौर पर मई या जून महीने में पड़ती है। वर्ष 2025 में कबीर जयंती 11 जून को मनाई जाएगी। इस दिन संत कबीरदास की स्मृति में सत्संग, भजन, कीर्तन और उनके उपदेशों का पाठ किया जाता है। संत कबीर जयंती न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक सुधार और समरसता का संदेश देने वाली भी है।
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संत कबीर का जीवन परिचय
संत कबीरदास 15वीं शताब्दी के महान संत, कवि और समाज सुधारक थे। इनका जन्म काशी (वाराणसी) के पास लहरतारा में हुआ माना जाता है। एक कथा के अनुसार उन्हें एक मुस्लिम दंपति नीरू और नीमा ने गंगा तट पर पाया और अपने पुत्र की भांति पाला। कबीरदास ने किसी गुरु से औपचारिक शिक्षा नहीं ली, परंतु उन्होंने जीवन के अनुभवों से गहन ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने न तो हिंदू रीति-रिवाजों को पूर्णतः स्वीकारा और न ही मुस्लिम पंथ की कट्टरता को, बल्कि दोनों के मध्य सत्य का मार्ग चुना। संत कबीर ने जीवन भर भक्ति, मानवता और समानता का संदेश दिया। वे रामानंदजी को अपना गुरु मानते थे।
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कबीरदास ने जातिवाद, पाखंड, मूर्तिपूजा और धार्मिक आडंबरों का विरोध किया। उनका मानना था कि ईश्वर एक है और उसे सच्चे हृदय से याद करने से ही उसका अनुभव किया जा सकता है। उन्होंने साधारण जनमानस की भाषा में दोहे रचे, जो आज भी जन-जन में प्रचलित हैं।
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संत कबीर के 5 प्रसिद्ध दोहे और उनके अर्थ

"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥"

जब इंसान दूसरों में बुराई खोजता है तो कुछ नहीं मिलता, लेकिन जब वह खुद को देखता है तो पाता है कि सबसे बड़ी कमी उसी में है।

"पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥"

अधिक ग्रंथ पढ़ने से कोई विद्वान नहीं बनता। सच्चा ज्ञान तो प्रेम की भावना को समझने और अपनाने में है।

"साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय॥"

संत को ऐसा होना चाहिए जो अनावश्यक बातों को त्याग कर केवल सत्य और सार को अपनाए।

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥
"
किसी व्यक्ति की जाति नहीं, उसके ज्ञान और व्यवहार को महत्व देना चाहिए। जैसे तलवार की धार मूल्यवान होती है, म्यान नहीं।

"दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय॥"

मनुष्य केवल दुःख में ईश्वर को याद करता है। यदि वह सुख में भी ईश्वर को स्मरण करे, तो उसे कभी दुख का सामना नहीं करना पड़ेगा।

संत कबीर के दोहे हमें आत्मचिंतन, प्रेम, भक्ति और समरसता का मार्ग दिखाते हैं। उनका साहित्य आज भी समाज को जागरूक करने वाला प्रकाशपुंज है।

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