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सीख: शिक्षकों की डांट फटकार का सकारात्मक असर भविष्य में हमारे करियर पर दिखता है

Mon, 30 Apr 2018 12:36 PM IST
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला Updated Mon, 30 Apr 2018 12:36 PM IST
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effect of teachers strict is seen in our future

श्रेयस दस साल बाद अपने कॉलेज लौट रहा था। उसके मन में पुराने दिनों की यादें ताजा थीं। कॉलेज पहुंचने पर एक छात्र ने श्रेयस से पूछा, कॉलेज की कौन-सी बात आप सबसे ज्यादा याद करते हैं? श्रेयस बोला, हमारा बैच भी आप लोगों के बैच की तरह बहुत शरारती था। मुझे याद है, मेरे दोस्त प्रोफेसरों से खूब डांट खाते थे। वह बात अलग है कि उसमें भी सबसे आगे मैं ही रहता था। हम लोगों को ढेर सारी आर्ट शीट तैयार करनी होती थीं। उसमें कभी घर, कभी कोई बिल्डिंग, तो कभी पार्क का नक्शा बनाना होता था। पूरे नक्शे में कम से कम हजार छोटी-छोटी लाइनें तो होती ही होंगी। उनमें से अगर किसी एक लाइन में जरा-सी भी गड़बड़ी होती थी, तो प्रोफेसर पूरा नक्शा काट देते थे।

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नक्शे पेंसिल से बनते थे। हम लोग उसे मिटाकर सही भी तो कर सकते थे। लेकिन नहीं, प्रोफेसर को वैसा नहीं चाहिए था। हमें लगता था कि इस एक लाइन से ऐसा क्या हो जाएगा, जो प्रोफेसर ने हमारी पूरी मेहनत को सिरे से नकार दिया। मुझे हमेशा यही लगता था कि प्रोफेसर को मुझसे दुश्मनी है, क्योंकि मेरा एक भी नक्शा ऐसा नहीं होता था, जिसे कम से कम पांच-छह बार काटा न गया हो। हालांकि हम लोग भी कोई कसर नहीं छोड़ते थे। तभी तो हर दूसरे दिन प्रोफेसर की मोटर साइकल का टायर पंचर हो जाया करता था। उस समय दिल को इतनी ठंडक मिलती थी कि क्या बताऊं। श्रेयस की बातें सुनकर आसपास ठहाके गूंज रहे थे।
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श्रेयस बोला, लेकिन दोस्तो, सच बताऊं, आज मैं जो भी हूं, वह सिर्फ अपने प्रोफेसर की वजह से ही हूं। पिछले दस साल में मैंने जितने नक्शे बनाए, वे आज बड़ी इमारतों, अस्पताल, घर, मॉल व पार्क में तब्दील हो चुके हैं। मैं बस आपसे यही कहना चाहूंगा कि कभी-कभी हम शॉर्टकट से आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन वह सफलता क्षणभंगुर ही होती है। मुझे यकीन है कि अगर आप मेहनत करेंगे, तो आपकी मेहनत कभी बेकार नहीं जाएगी।

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