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सीख: बदलते सिर्फ हम हैं, बदलता हमारा नजरिया है
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Updated Mon, 29 Jan 2018 02:27 PM IST
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रिया एक अरबपति की इकलौती बेटी थी। एक दिन वह अपने दादा जी के साथ शाम की सैर पर निकली। मौसम बहुत सुहावना था। कुछ देर पहले ही बारिश भी हुई थी और पास की दुकान से गर्मागर्म समोसे की महक उन दोनों को अपनी ओर खींच रही थी। काफी देर तक खुद को रोकने के बाद रिया ने दादा जी से समोसे खाने की इच्छा जताई। दादा जी थोड़ा हिचकिचाए, फिर बोले, चलो ठीक है, खा लो। रिया और दादा जी, दोनों गर्म समोसे का लुत्फ उठाने लगे।
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तभी वहां एक गरीब लड़का आया और थोड़ी दूर बैठकर उन दोनों को देखने लगा। रिया की जब उस पर नजर पड़ी, तो उसने दादा जी से गुजारिश की कि एक समोसा उसे भी दिला दें। दादा जी को यह बात अच्छी लगी। उन्होंने रिया को पैसे दिए और कहा, तुम उसके लिए दो समोसे लेकर अपने हाथों से दे आओ। रिया ने दो समोसे खरीदकर उस लड़के को दिए। जब वह लौटकर आई, तो देखा, दादा जी किसी सोच में डूबे हुए थे। रिया ने पूछा, दादा जी आप किस सोच में डूबे हुए हैं? पहले भी मैंने देखा कि जब मैंने आपसे समोसा खाने को बोला था, तो आप हिचकिचा रहे थे। आखिर बात क्या है? दादा जी बोले, मैंने आज तुमसे बहुत कुछ सीखा है।
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रिया ने हैरान होकर पूछा, मुझसे, वह कैसे? दादा जी बोले, जब तुमने सड़क किनारे की दुकान से समोसे खाने की बात की, तो पहले मेरा मन नहीं मान रहा था। कई बार हमारे अनुभव और परिस्थितियां हमें कड़क बना देती हैं। इतना कि हम कुछ भी नया, अलग करने से भी डरने लगते हैं। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है, मैंने अपने बचपन में जाने कितनी बार सड़क किनारे समोसे खाए होंगे। पर अब न जाने क्यों, मन हिचकिचाने लगता है। फिर जब तुमने उस लड़के की तरफ इशारा किया, तब मुझे एहसास हुआ कि हम भले ही कितने भी अमीर हो जाएं, लेकिन उससे इस समोसे का स्वाद कभी नहीं बदलेगा।
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