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एक मुसलमान भक्त ने भगवान बद्रीनाथ की लिखी थी आरती, बदल लिया था अपना नाम
अमर उजाला, संपादकीय डेस्क
Updated Fri, 20 Apr 2018 10:38 AM IST
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सौभाग्य से और प्रभु कृपा से मैं स्वयं सपत्नीक और सपरिवार दो-तीन बार हिमालय वाले चारों धामों के दर्शन कर चुका हूं। वहां के पंडों, पुजारियों, बस्तीजनों और अन्य लोगों से तरह-तरह की जानकारी मिलती रहती हैं। उनमें एक यह कि कैसी भी प्राकृतिक तबाहियां आई हो, पर चारों धाम सुरक्षित रहे। व्यवस्था और व्यवस्थापकों ने उन्हें बचाया और सजाए-संवारे रखा। छोटे बड़े बदलाव और निर्माण तो होते रहे हैं पर मूलरूप जस का तस है। भले ही किवदंतियां हजारों हैं, पर मूल कथानक हजारों वर्षों से वही चला आ रहा है।
इस बार मेरे एक मित्र केशवचन्द्र एम. शर्मा क्रिसमस पर श्री बद्रीनाथ धाम में ही थे। शर्मा जी ने मुझे एक पत्र लिखा। उस पत्र में जो लिखा वह मेरे लिए नई बात नहीं थी। बात यह कि भगवान बद्रीनाथ की जो आरती वहां गाई जाती है, वह एक मुसलमान भक्त की लिखी हुई है। उस भक्त का मूल नाम फखरुद्दीन था, पर उनकी लिखी आरती जब मंदिरों में गूंजने लगी, तो उन्होंने अपना नाम बदलकर बदरुद्दीन कर लिया। फखरुद्दीन तब अठारह वर्ष के थे और चमोली जिले के नंदप्रयाग में पोस्ट मास्टर थे और वहीं रहते थे। उन्होंने 1865 में बद्रीनाथजी की आरती लिखी। फखरुद्दीन का निधन एक सौ चार वर्ष की उम्र में हुआ। वे जब तक जिए बद्री-केदार समिति के सदस्य रहे। उनके परिवार के लोग अब भी बद्रीनाथ में रहते हैं।
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इस बार मेरे एक मित्र केशवचन्द्र एम. शर्मा क्रिसमस पर श्री बद्रीनाथ धाम में ही थे। शर्मा जी ने मुझे एक पत्र लिखा। उस पत्र में जो लिखा वह मेरे लिए नई बात नहीं थी। बात यह कि भगवान बद्रीनाथ की जो आरती वहां गाई जाती है, वह एक मुसलमान भक्त की लिखी हुई है। उस भक्त का मूल नाम फखरुद्दीन था, पर उनकी लिखी आरती जब मंदिरों में गूंजने लगी, तो उन्होंने अपना नाम बदलकर बदरुद्दीन कर लिया। फखरुद्दीन तब अठारह वर्ष के थे और चमोली जिले के नंदप्रयाग में पोस्ट मास्टर थे और वहीं रहते थे। उन्होंने 1865 में बद्रीनाथजी की आरती लिखी। फखरुद्दीन का निधन एक सौ चार वर्ष की उम्र में हुआ। वे जब तक जिए बद्री-केदार समिति के सदस्य रहे। उनके परिवार के लोग अब भी बद्रीनाथ में रहते हैं।
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बद्रीनाथ महात्म्य नामक पुस्तक में इसका उल्लेख है। बदरुद्दीन के पौत्र का कहना है कि पहले श्री बद्रीनाथजी के मंदिर की दीवार पर यह आरती लिखी गई थी, ताकि लोगों को याद रहे। दीवार पर पढ़कर लोग इस आरती को गाते थे। अपने देश में बद्रीनाथजी की आरती का मुस्लिम द्वारा लिखा जाना कोई विचित्र प्रसंग नहीं लगता। महाकवि रसखान, कवि श्रेष्ठ रहीम, महाकाव्यकार मलिक मोहम्मद जायसी जैसे अनेक मुस्लिम कवि-गीतकारों द्वारा रचित आरतियां और भजन-कीर्तन मंदिरों, मठों और आश्रमों में गाए जाते हैं।
इस सदी का एक जीवित नाम है भाई अब्दुल जब्बार, जो चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) के निवासी हैं और पिछले 50 वर्षों से हिन्दी कवि सम्मेलनों के मंच पर सुसम्मानित हैं। उनका लिखा गंगा गीत ''निर्मल नीर गंगा का" आज भी हरिद्वार में हरकी पौड़ी पर गाया, बजाया और सुना जाता है। हमारी संस्कृति में साहित्य का शिखर सर्वोपरि है। एक महाकवि ने लिखा है-"ऐसे मुसलमान पर कोटिन हिन्दू वारिये।"
बद्रीनाथ जी की आरती
पवन मंद सुगंध शीतल हेम मंदिर शोभितम्।
निकट गंगा बहत निर्मल, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।
शेष सुमिरन करत निशदिन, ध्यान धारत महेश्वरम्।
श्री वेद ब्रह्मा करत स्तुति, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।
इन्द्र, चन्द्र, कुबेर, दिनकर, धूप दीप निवेदितम्।
सिद्धि मुनिजन करत जै जो, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।
शक्ति गौरी गणेश शारद नारद मुनि उच्चारणम्।
योग ध्यान अपार लीला, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।
यक्ष किन्नर करत कौतुक, गान गंधर्व प्रकाशितम्।
श्री लक्ष्मी कमला चँवर डोलें, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।
कैलाश में देव निरंजन, शैल-शिखर महेश्वरम्।
राजा युधिष्ठिर करत स्तुति, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।
श्री बद्रीनाथ जी की परम स्तुति, यह पढ़त पाप विनाशम्।
कोटि तीर्थ सुपुण्य सुन्दर, सहज अति फलदायकम्।।
अमर उजाला के कल्पवृक्ष पन्ने से साभार
इस सदी का एक जीवित नाम है भाई अब्दुल जब्बार, जो चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) के निवासी हैं और पिछले 50 वर्षों से हिन्दी कवि सम्मेलनों के मंच पर सुसम्मानित हैं। उनका लिखा गंगा गीत ''निर्मल नीर गंगा का" आज भी हरिद्वार में हरकी पौड़ी पर गाया, बजाया और सुना जाता है। हमारी संस्कृति में साहित्य का शिखर सर्वोपरि है। एक महाकवि ने लिखा है-"ऐसे मुसलमान पर कोटिन हिन्दू वारिये।"
बद्रीनाथ जी की आरती
पवन मंद सुगंध शीतल हेम मंदिर शोभितम्।
निकट गंगा बहत निर्मल, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।
शेष सुमिरन करत निशदिन, ध्यान धारत महेश्वरम्।
श्री वेद ब्रह्मा करत स्तुति, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।
इन्द्र, चन्द्र, कुबेर, दिनकर, धूप दीप निवेदितम्।
सिद्धि मुनिजन करत जै जो, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।
शक्ति गौरी गणेश शारद नारद मुनि उच्चारणम्।
योग ध्यान अपार लीला, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।
यक्ष किन्नर करत कौतुक, गान गंधर्व प्रकाशितम्।
श्री लक्ष्मी कमला चँवर डोलें, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।
कैलाश में देव निरंजन, शैल-शिखर महेश्वरम्।
राजा युधिष्ठिर करत स्तुति, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।
श्री बद्रीनाथ जी की परम स्तुति, यह पढ़त पाप विनाशम्।
कोटि तीर्थ सुपुण्य सुन्दर, सहज अति फलदायकम्।।
अमर उजाला के कल्पवृक्ष पन्ने से साभार