धर्म तो बहुत हैं, थोड़ा सा अंतर कर्मकांड में है, लेकिन संदेश एक
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देश और दुनिया में जितने भी धर्म हैं, उन्होंने एक ही तरह के सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। थोड़ा सा अंतर कर्मकांड में है, लेकिन संदेश एक है।
हर देश, समाज और समय में ऐसे व्यक्ति होते आए हैं, जिन्होंने एक ही तरह के सिद्धांत प्रस्तुत किए। थोड़ा सा अंतर कर्मकांड में है, जो परिस्थितियों और सामाजिक स्थितियों के कारण है। उद्देश्य सभी का एक ही है। दुनिया में कोई ग्यारह प्रमुख और बड़े मजहब या धर्म हैं। जापान का शिन्तो, चीन का ताओ और कन्फ्यूशियस मत, भारत का वैदिक, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी, यहूदी, ईसाई और इस्लाम मत।
सभी धर्मों का स्वरूप एक ही संदेश को विभिन्न रूपों में समझाने का प्रयास करता है। सभी मत हैं, धर्म नहीं। धर्म तो मूलतः मनुष्यत्व में, उसकी विवेकशीलता में है। जापान का शितों मत पवित्रता को धर्म का प्रधान गुण मानता है। उसके अनुसार, निश्छलता पवित्रता का प्रमुख अंग है तथा ईश्वर प्राप्ति का राजमार्ग भी। इस मत की हर किसी को प्रार्थना करनी चाहिए।
जिसका भाव यह रहे कि हमारी आंखें भले ही अपवित्र वस्तु देखें, किंतु हृदय में अपवित्र बातों का उदय न हो। कान भले ही अपवित्र बात सुनें, किन्तु चित्त में अपवित्र भाव न हो। पूजा पद्धति में भी शिन्तो ने मनोनिग्रह के लिए ध्यान और पवित्रता के लिए मंत्र के पाठ पर जोर दिया है। ताओ मत के अनुसार, ईश्वर को पाने के लिए पवित्रता, विनय, संतोष, करुणा, सच्चा ज्ञान और संयम मुख्य साधन हैं। ध्यान और प्राणायाम इनके लिए उपयोगी प्रक्रियाएं हैं। मनुष्य के लिए ताओ का संदेश है कि मेरे पास तीन वस्तु या भाव हैं, जिन्हें बुलाता रहता हूं सौम्यता (दयालुता), मितव्ययिता और नम्रता।
कन्फ्यूशियस चीन के प्रसिद्ध उपदेशक और सिद्ध पुरुष हो चुके हैं। उन्होंने मनुष्य की उत्कृष्टता पर जोर दिया है। उनका संदेश यही था कि ‘वैयक्तिक उन्नति जीवन का लक्ष्य नहीं, वह तो सामाजिक उन्नति का फल है। धर्म वह है, जब तुम किसी से मिलो, तो यह समझकर मिलो जैसे वह तुम्हारा बड़ा अतिथि है। मनुष्य का हृदय आइने की तरह होना चाहिए, जिस पर प्रतिबिम्ब तो सभी का आता है, किन्तु उसमें मैलापन नहीं आता।
वेदांत प्रतिपादित करता है कि मूल में सारा जगत एक है। जिसे एकत्व का दर्शन हो जाता है, उसकी दृष्टि में स्वार्थ और परमार्थ में भेद नहीं रह जाता है। इस दिव्य दृष्टि की परिणति सबको अपने में तथा अपने को सबमें देखने के रूप में होती है। उसके हृदय से ‘आत्मवत सर्व भूतेषु तथा वसुधैव कुटुम्बकम्’ का घोष गूंजने लगता है। अथर्ववेद (3-30-1) की उक्ति है- सहृदयं सामनस्य माविद्वेषं कृणोमि वः।
अन्योअन्यम मिहर्यत वत्सं जात मिवाहन्या॥ अर्थात्- हमारे हृदय और बुद्धि एक तथा दोषरहित हों। परस्पर इस तरह बर्ताव करें जैसे गाय अपने नवजात बच्चे के साथ करती है। बुद्ध ने स्वयं को उदाहरण रूप में प्रस्तुत कर लोगों को पवित्र और श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा दी थी। उन्होंने कहा भी कि ‘धर्मग्रंथों का कितना ही पाठ करें, लेकिन यदि मनुष्य उनके अनुसार आचरण नहीं करता, तो दूसरे की गाय गिनने वाले ग्वाले की तरह वह श्रमण नहीं होता।
जैन मत के अनुसार, सफलता के लिए तीन बातों की जरूरत है- श्रद्धा, ज्ञान और क्रिया। जैन शास्त्रों में इसे सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र के रूप में उल्लेखित किया गया है। गुरु नानक ने सिख धर्म से ऋषि परंपरा को फिर से समय के अनुरूप तैयार किया, तो गुरु गोविंद सिंह ने इसे प्रगतिशील बनाया। अपने शिष्यों को राष्ट्र व मानवता हेतु अपनी आहुति, अपना बलिदान प्रस्तुत करने को कहा था। उस परंपरा को आगे भी बनाए रखने के लिए उनने प्रत्येक सिख को शास्त्रादपि शरादपि का “माला और भाला” साथ रखने का, अनीति से सदैव जूझते रहने का संदेश दिया।
पारसी धर्म के प्रवर्तक जरथुष्ट्र की धर्मनीति के मुख्य चरण हैं- हुमत अर्थात् उत्तम विचार, हुख्त अर्थात् उत्तम वचन और हुश्वर्त अर्थात् उत्तम कार्य। ईश्वर के साक्षी व प्रेरक रूप हेतु उन्होंने अग्नि को स्वीकृत किया तथा अग्नि की तरह प्रखर, प्रकाशवान, ऊर्ध्वगामी व परोपकारी वृत्ति का बनने की प्रेरणा दी।
यहूदी मत का मूल दर्शन- ईश्वर के एकत्व, ईश्वर की पवित्रता तथा उसकी निराकारिता में सन्निहित है। संसार के दो मुख्य मत- ईसाई और इस्लाम इसी से प्रस्फुटित हुए हैं। ईसाई मत के अनुसार, प्रेम ही परमेश्वर है। प्रेम ही पूजा एवं आराधना है, उसकी परिणति है।
अपनी प्रार्थना में हर ईसाई यह कहता है- ‘परमात्मा! मुझे अपनी राह दिखा। अपने संबंध में ज्ञान करा और सत्य मार्ग पर मुझे चला। मेरी मुक्ति का ईश्वर तू ही है। मेरे ज्ञान चक्षु खोल, जिससे मैं तेरी प्रेमपूर्ण आश्चर्यजनक कृतियों को समझ सकूं ईसाई मत के मूलाधार तो स्वयं ईसा हैं, जिन्होंने मानवता एवं आदर्श हेतु अपना बलिदान प्रस्तुत किया था।
इस्लाम मत के संस्थापक हजरत मुहम्मद ने प्रत्येक व्यक्ति को सदाचारी और कर्त्तव्य-परायण बनने पर जोर भर दिया। ‘उनकी घोषणा थी कि हर इंसान अल्लाह का कुनबा है।’ वह कहते हैं, 'आओ! तुम और हम मिलकर उन चीजों पर मेल कर लें, जो हम दोनों में एक-सी हैं', इन तथ्यों के आधार पर धर्म के मूलभूत दर्शन में कहीं भी कोई भिन्नता नहीं नजर आती।
कल्पवृक्ष डेस्क/ अमर उजाला