धर्म तो बहुत हैं, थोड़ा सा अंतर कर्मकांड में है, लेकिन संदेश एक

श्रीराम शरणम् Updated Fri, 10 Nov 2017 04:27 PM IST
 way of expressions of truth is different but principle is same
देश और दुनिया में जितने भी धर्म हैं, उन्होंने एक ही तरह के सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। थोड़ा सा अंतर कर्मकांड में है, लेकिन संदेश एक है। 

हर देश, समाज और समय में ऐसे व्यक्ति होते आए हैं, जिन्होंने एक ही तरह के सिद्धांत प्रस्तुत किए। थोड़ा सा अंतर कर्मकांड में है, जो परिस्थितियों और सामाजिक स्थितियों के कारण है। उद्देश्य सभी का एक ही है। दुनिया में कोई ग्यारह प्रमुख और बड़े मजहब या धर्म हैं। जापान का शिन्तो, चीन का ताओ और कन्फ्यूशियस मत, भारत का वैदिक, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी, यहूदी, ईसाई और इस्लाम मत।

सभी धर्मों का स्वरूप एक ही संदेश को विभिन्न रूपों में समझाने का प्रयास करता है। सभी मत हैं, धर्म नहीं। धर्म तो मूलतः मनुष्यत्व में, उसकी विवेकशीलता में है। जापान का शितों मत पवित्रता को धर्म का प्रधान गुण मानता है। उसके अनुसार, निश्छलता पवित्रता का प्रमुख अंग है तथा ईश्वर प्राप्ति का राजमार्ग भी। इस मत की हर किसी को प्रार्थना करनी चाहिए।

जिसका भाव यह रहे कि हमारी आंखें भले ही अपवित्र वस्तु देखें, किंतु हृदय में अपवित्र बातों का उदय न हो। कान भले ही अपवित्र बात सुनें, किन्तु चित्त में अपवित्र भाव न हो। पूजा पद्धति में भी शिन्तो ने मनोनिग्रह के लिए ध्यान और पवित्रता के लिए मंत्र के पाठ पर जोर दिया है। ताओ मत के अनुसार, ईश्वर को पाने के लिए पवित्रता, विनय, संतोष, करुणा, सच्चा ज्ञान और संयम मुख्य साधन हैं। ध्यान और प्राणायाम इनके लिए उपयोगी प्रक्रियाएं हैं। मनुष्य के लिए ताओ का संदेश है कि मेरे पास तीन वस्तु या भाव हैं, जिन्हें बुलाता रहता हूं सौम्यता (दयालुता), मितव्ययिता और नम्रता।

 कन्फ्यूशियस चीन के प्रसिद्ध उपदेशक और सिद्ध पुरुष हो चुके हैं। उन्होंने मनुष्य की उत्कृष्टता पर जोर दिया है। उनका संदेश यही था कि ‘वैयक्तिक उन्नति जीवन का लक्ष्य नहीं, वह तो सामाजिक उन्नति का फल है। धर्म वह है, जब तुम किसी से मिलो, तो यह समझकर मिलो जैसे वह तुम्हारा बड़ा अतिथि है। मनुष्य का हृदय आइने की तरह होना चाहिए, जिस पर प्रतिबिम्ब तो सभी का आता है, किन्तु उसमें मैलापन नहीं आता। 
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