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वल्लभाचार्य जयंती 2018: जगत, जीव और ईश्वर तीनों ही आनंद है

Fri, 06 Apr 2018 03:30 PM IST
संत बृजनंदन दास
संत बृजनंदन दास Updated Fri, 06 Apr 2018 03:30 PM IST
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vallabha charya Jayanti 2018 will celebrate birth anniversary on 12 april

जो सत्य है, उसका कभी विनाश नहीं हो सकता और जो असत्य है, वह कायम नहीं रह सकता। जगत भी ब्रह्म का ही अविकृत परिणाम है। सत्य है ही इसलिए कि उसका कभी विनाश नहीं हो सकता। केवल आविर्भाव और तिरोभाव होता है। सृष्टि की रचना होती है, तो जगत व्यक्त हो जाता है, यह उसके आविर्भाव की स्थिति है। तिरोभाव की स्थिति में जगत अपने कारण रूप ब्रह्म में लीन रहता है। जब ब्रह्म जगत के रूप में क्रीड़ा करना चाहते हैं, तो वे स्वयं ही जगत रूप बन जाते हैं। जगत के रूप में भगवान ही क्रीड़ा करते हैं, इसलिए जगत भगवान का ही रूप है और इसी कारण सत्य है, मिथ्या या मायिक नहीं है। 

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महाप्रभु वल्लभाचार्य का यह चिंतन आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत के उलट समझा जाता है, जिसके अनुसार संसार मिथ्या है, उसका कोई अस्तित्व नहीं है। वह केवल होने का आभास देता है। वल्लभाचार्य का दर्शन अस्तित्व और अनस्तित्व की लड़ाई में न पड़कर संसार को खेल, तो परमात्मा को खिलाड़ी मानता है।
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अपने इन सिद्धांतों की स्थापना के लिए वल्लभाचार्य ने तीन बार भारत का भ्रमण किया। यह यात्राएं सिद्धांतों के प्रचार के लिए थीं और करीब 19 वर्षों में पूरी हुई। प्रवास के समय वे भीड़-भाड़ से दूर एकांत में कहीं ठहरते थे। जहां-जहां वे ठहरे उन स्थानों को बैठक के नाम से जाना जाता है। यात्राओं के दौरान उन्होंने मथुरा, गोवर्धन आदि स्थानों में श्रीनाथजी की पूजा का इंतजाम किया और लोगों को निष्काम भक्ति के लिए प्रेरित किया।

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वल्लभाचार्य की 84 बैठक, 84 शिष्य और 84 ग्रंथ प्रसिद्ध हैं

दूसरी यात्रा के समय उनका विवाह हुआ। विवाह के बाद वे प्रयाग के पास यमुना किनारे अडैल गांव में बस गए। गोपीनाथ और विट्ठलनाथ नाम से दो पुत्र हुए फिर वे वृन्दावन चले गए और कृष्ण की भक्ति में लीन रहे। संवत् 1556 में उनकी प्रेरणा से गिरिराज में श्रीनाथजी का विशाल मंदिर बनकर तैयार हुआ। मंदिर 20 साल में बनकर पूरा हुआ। महाप्रभु वल्लभाचार्य के संस्थापित पुष्टिमार्ग में कई भक्त कवि हुए हैं। महाकवि सूरदास, कुम्भनदास, परमानंददास, कृष्णदास आदि खास हैं।

गोसाई विट्ठलदास ने पुष्टिमार्ग के इन आठ कवियों को अष्टछाप के रूप में सम्मानित किया है। वल्लभाचार्य की 84 बैठक, 84 शिष्य और 84 ग्रंथ प्रसिद्ध हैं। इन ग्रन्थों के अलावा वल्लभाचार्य ने और भी अनेक ग्रन्थों और स्तोत्रों की रचना की। काशी के हनुमान घाट पर वल्लभाचार्यजी ने अपने दोनों पुत्रों गोपीनाथजी और विट्ठलनाथजी को अपने प्रमुख भक्त दामोदरदास हरसानी एवं अन्य वैष्णवजनों की उपस्थिति में अंतिम शिक्षा दी। फिर वह करीब 40 दिन तक निराहार रहे, मौन धारण कर लिया और आषाढ़ शुक्ल 3 संवत 1587 को जल समाधि ले ली।

पुषि्टमार्ग के प्रवर्तक वल्लाभाचार्यजी के बारे में उनके भक्तों और श्रद्धालुजनों का मानना है कि शास्त्रों की दुरुह अवस्था देखकर वे कई दिन बेसुध पड़े रहे थे। इसी बीच उन्हें प्रेरणा हुई और उन्होंने भक्ति के आसान उपायों का प्रचार किया। अष्टछाप के कवि, जिनमें सूरदास, कृष्णदास, गोविंदस्वामी और चतुर्भुजदास आदि भी आते थे। भक्तिमार्ग को काव्यधारा से समृद्ध करने के लिए जाने जाते हैं। पुष्टिमार्ग, कृष्णभक्ति और सात्विक जीवन उनके भक्तिमार्ग के मंत्र हैं।
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