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Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   Vaishakh Amavasya 2025 Amavasya Importance And Significance Know Katha

Vaishakh Amavasya 2025: 27 अप्रैल को वैशाख अमावस्या, मोक्ष और मनोकामनाओं की पूर्ति का पावन पर्व

Fri, 25 Apr 2025 06:22 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Fri, 25 Apr 2025 06:22 AM IST
सार

27 अप्रैल को वैशाख अमावस्या है। स्कंद पुराण के अनुसार परम पवित्र वैशाख मास में जब सूर्य मेष राशि में स्थित हों,तब पापनाशिनी अमावस्या कोटि गया के समान फल देने वाली मानी गई है।

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Vaishakh Amavasya 2025 Amavasya Importance And Significance Know Katha
अमावस्या पर पवित्र नदियों में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। - फोटो : adobe stock

विस्तार

शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इस मास की अमावस्या तिथि का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व होता है। इस वर्ष वैशाख अमावस्या 27 अप्रैल को पड़ रही है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और भगवान लक्ष्मी नारायण की विधिपूर्वक पूजा करने से व्यक्ति को न केवल समस्त पापों से मुक्ति मिलती है, बल्कि मृत्युपरांत मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।
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वैशाख अमावस्या की महिमा
मान्यता है कि इस मास की सभी तिथियां पुण्यदायिनी मानी गई हैं। एक-एक तिथि में किया हुआ पुण्य कोटि-कोटि गुना अधिक होता है। उनमें भी जो वैशाख की अमावस्या तिथि है,वह मनुष्यों को मोक्ष देने वाली है। स्कंद पुराण के अनुसार परम पवित्र वैशाख मास में जब सूर्य मेष राशि में स्थित हों,तब पापनाशिनी अमावस्या कोटि गया के समान फल देने वाली मानी गई है। जो प्राणी इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करके पितरों के निमित्त श्रद्धा पूर्वक जल से भरा हुआ कलश, तिल, पिंड और वस्त्र दान करता है, उसे अक्षय फल की प्राप्ति होती है एवं उसके पितरों को मोक्ष मिलता है। यदि कोई व्यक्ति पूर्वजों की आत्मा की शांति हेतु इस दिन व्रत रखता है, ब्राह्मणों को भोजन कराता है और श्रद्धा से पिंडदान करता है, तो न केवल उसके पितर तृप्त होते हैं, बल्कि उसे स्वयं भी मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह तिथि देवताओं की भी अत्यंत प्रिय मानी गई है और इसी कारण इस दिन किए गए कर्म, साधना और दान-दक्षिणा विशेष फलदायी होते हैं। इस दिन प्याऊ लगाना,छायादार वृक्ष लगाना,पशु-पक्षियों के खान-पान की व्यवस्था करना,राहगीरों को जल पिलाना जैसे सत्कर्म मनुष्य के जीवन को समृद्धि के पथ पर ले जाते हैं।
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धर्मवर्ण की पौराणिक कथा
वैशाख अमावस्या के महत्व से जुड़ी एक पौरणिक कथा के अनुसार तीसवें कलयुग के अंत में जब सभी धर्मों का लोप हो चुका था। उसी समय आनर्त देश में धर्मवर्ण नाम के एक विख्यात ब्राह्मण बेहद ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। वह हमेशा व्रत-उपवास करते रहते व ऋषि-मुनियों का आदर करते और उनसे ज्ञान ग्रहण करते। एक बार उन्होंने महर्षियों  के मुख से सुना कि कलयुग में भगवान विष्णु के नाम के स्मरण से ज्यादा पुण्य किसी भी कार्य में नहीं है। अन्य युगों में जो पुण्य यज्ञ करने से प्राप्त होता था उससे कहीं अधिक पुण्य फल इस घोर कलयुग में भगवान का नाम सुमिरन करने से मिल जाता है। धर्मवर्ण ने इस बात को आत्मसात कर लिया और सांसारिक जीवन छोड़कर संन्यास लेकर भ्रमण करने लगे। एक दिन घूमते-घूमते वह पितृलोक जा पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि उनके पितर बहुत कष्ट में हैं।

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पितरों ने धर्मवर्ण को बताया कि उनकी ऐसी हालत तुम्हारे संन्यास के कारण हुई है। क्योंकि अब उनके लिए पिंडदान करने वाला कोई शेष नहीं है। अगर तुम वापस जाकर अपने गृहस्थ जीवन की शुरुआत करो एवं विधि-विधान से पिंडदान करो तो हमें इस कष्ट से मुक्ति मिल सकती है। पितरों की बात सुनने के बाद धर्मवर्ण ने वचन दिया कि वह उनकी आज्ञा का पालन अवश्य  करेंगे। भूलोक पर आकर धर्मवर्ण ने अपना संन्यासी जीवन त्यागकर गृहस्थ-धर्म को अपना लिया। और फिर कुंभदानसहित पापविनाशक श्राद्ध करके उसके द्वारा पितरों को पुनरावृत्तिरहित मुक्ति प्रदान की। तत्पश्चात उन्होंने स्वयं विवाह करके उत्तम संतान को जन्म दिया और लोक में उस पापनाशिनी अमावस्या तिथि को प्रसिद्ध किया। इसलिए वैशाख मास की अमावस्या तिथि परम पवित्र मानी गई है।


 
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