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ईश्वर कुछ खाते-पीते नहीं हैं, तो करते क्या हैं वो आपसे चाहते क्या हैं?

स्वामी रामनरेशाचार्य Updated Fri, 16 Feb 2018 06:41 PM IST
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ईश्वर कुछ खाते-पीते नहीं हैं, तो करते क्या हैं? वह केवल स्वीकार करते हैं। उन्हें जो भी दें, भक्ति से दें। मन को समाहित करके, संयत करके दें। 
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ईश्वर को हम क्या देंगे, वह तो सर्व-साधन संपन्न हैं। फिर भी नियम है कि भगवान के यहां खाली हाथ न जाएं, पत्ता ही चलेगा। जरूरी नहीं कि वह पत्ता तुलसी या बेलपत्र का हो, कोई भी पत्ता दीजिए। भगवान ने कहा कि 'जो भी पत्ता, पुष्प, फल दें, भक्ति से दें।' एक शर्त भगवान ने और लगा दी कि जो भी दे रहे हैं, मन को समाहित करके, संयत करके दीजिए। 

एक कथा सुनाता हूं। छपरा जिले के एक संत थे हलकोरी बाबा, कबीरपंथी महात्मा थे। उन्हें सैकड़ों जन्म दिखते थे, जो बीत गए और जो आने वाले हैं सब। वहां प्रथा थी कि जन्म होने पर ही कंठी पहना देते थे, उनको भी बांध दी गई। सयाने हुए, तो पूछा कि यह धागा क्या है? लोगों ने कहा कि वहां तुम्हारे गुरु की समाधि है, उनसे पूछो। वहां जाने पर उन्हें गुरु के अनुग्रह से विशिष्ट दृष्टि प्राप्त हुईं। उन्होंने लौटकर घरवालों से कहा, 'मैं अब कुछ नहीं करूंगा। केवल राम-राम जपूंगा। मेरे हिस्से की जमीन के आधार पर आप मुझे रोटी दे देना।' वे केवल राम राम जपते थे। खूब जपा, उन्हें सारी सिद्धियां प्राप्त हो गईं। एक बार लोगों के आग्रह पर तीर्थ यात्रा पर आए, लेकिन भगवान विश्वनाथ के मंदिर में नहीं गए। बिना दर्शन किए लौटने लगे। 
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