यज्ञ और हवन में बची वस्तुओं का स्वामी कौन होता है?
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अनुमान न लगा पाने के कारण यज्ञ में कई बार काफी सामग्री बच जाती है। इस बची हुई सामग्री पर किसका अधिकार हैं? भागवत में इस विषय पर एक सुंदर आख्यान है।
मनुपुत्र नभग के पुत्र थे नाभाग। बरसों गुरुकुल में रहने के बाद नाभाग घर आए तो उन्हें पिता की देखभाल का जिम्मा सौंपा गया। संपत्ति तो अन्य भाई पहले ही बांट चुके थे। नाभाग ने अपने पिता को इस बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि-तुम उनकी बात न मानो।
हां मेरी सलाह मानकर स्वर्ग से आए अंगिरस गोत्री ब्राह्मण अपने यज्ञ में हर छठे दिन जो भूल करते हैं, उसे सुधारने के लिए दो मंत्र बता दो। इससे वे यज्ञ भूमि में बचा हुआ सारा धन तुम्हें दे देंगे। नाभाग ने बात मानी। और अंगिरस गोत्रीय ब्राहमणों ने भी उन्हें सारा धन दे दिया।
नाभाग जब धन लेकर चलने लगे तो उन्हें उत्तर दिशा से आए एक कृष्णवर्ण के पुरुष ने कहा-यज्ञ भूमि की बची हुई संपत्ति पर मेरा अधिकार है।
यज्ञ में बची संपत्ति का असली स्वामी है यह
नाभाग ने कहा यह संपत्ति तो मुझे ऋषियों ने दी है। इस पर मेरा अधिकार है। तब उस पुरूष ने कहा कि इस विवाद के बारे में तुम्हारे पिता से ही पूछा जाए।
नाभाग अपने पिता के पास गए और सारी बात बताई। पिता ने कहा-बेटा, दक्ष प्रजापति के यज्ञ में ऋषि-मुनियों ने तय किया था कि यज्ञ भूमि की बची हुई सभी सामग्री पर रुद्र का अधिकार होगा। यह सारी सामग्री तो शिव को ही मिलनी चाहिए।
नाभाग फिर लौटे और रुद्ररूपधारी पुरुष को प्रणाम करते हुए अपनी गलती स्वीकार की। तब रुद्र ने उन्हें धर्म की शिक्षा देते हुए यज्ञ भूमि की सारी सामग्री भी भेंट कर दी। वृद्ध पिता ने इस तरह मोह त्यागते हुए अपने पुत्र को रुद्रदेव के दर्शन के साथ धन का लाभ भी कराया।