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जानिए कैसे, बिना स्त्री पुरुष के मिलन के पैदा हुई यह कन्या

Wed, 06 May 2015 10:21 PM IST
Updated Wed, 06 May 2015 10:21 PM IST
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story of mahabharat satyavati
प्रकृति का नियम है स्त्री पुरूष के संयोग से संतान का जन्म होता है। यह नियम जीव-जंतुओं और मनुष्यों के लिए भी है। शास्त्रों में इस विषय में जो कथा मिलती है उसके अनुसार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी योग बल से मनुष्य को उत्पन्न कर थे। लेकिन इस क्रिया में काफी समय लगता था।
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ब्रह्मा जी ने भगवान शिव की तपस्या की और सृष्टि के विकास का दूसरा तरीका निकालने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने ब्रह्मा जी तपस्या से प्रसन्न होकर अर्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए इसके बाद से मैथुन क्रिया से सृष्टि का विकास आरंभ हुआ।
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लेकिन हम यहां जिस कन्या की बात करने जा रहे हैं उसका जन्म प्रकृति के इस नियम से हटकर हुआ था क्योंकि इसके जन्म में स्त्री पुरूष का संयोग नहीं हुआ था।

स्त्री के गर्भ से नहीं तो कैसे पैदा हुई यह कन्या?

story of mahabharat satyavati

हम जिस कन्या की बात कर रहे हैं वह महाभारत के भीष्म पितामह की सौतेली मां है इनका है सत्यवती। इनके जन्म की कहानी बड़ी ही अनोखी है। कथा के अनुसार राजा सुधन्वा एक बार वन में शिकार खेलने गए।

इस बीच इनकी पत्नी रजस्वला हुई और उनके मन में गर्भधारण की इच्छा जगी। रानी ने एक शिकारी पक्षी के द्वारा राजा के पास अपना संदेश भेजा। राजा ने एक पात्र में अपना वीर्य देकर पक्षी को रानी तक पहुंचाने के लिए कहा।

मार्ग में एक अन्य शिकारी पक्षी मिल गया जिसके साथ इसका युद्घ होने लगा। इससे वीर्य का पात्र छूटकर यमुना नदी में गिर गया। उस समय यमुना में ब्रह्मा जी के शाप से एक अप्सरा मछली रूप में रहती थी। इसने वीर्य को ग्रहण कर लिया। इसके प्रभाव से वह गर्भवती हो गयी।

गर्भकाल जब पूरा होने को आया तब एक दिन एक मछुआरे के जाल में वह मछली फंस गई। अद्भुत और विशाल मछली होने के कारण इसे राजा सुधन्वा के दरबार में लाया गया। जब मछली का पेट चीरा गया तो उसमें से एक बालक और एक कन्या निकली।

राजा सुधन्वा ने बालक को अपने पास रख लिया। लेकिन कन्या के शरीर से मछली की गंध आ रही थी इसलिए उसे मछुआरे को दे दिया गया और यह मत्स्यगंधा कहलायी।

शरीर से मछली की गंध फिर भी कामाशक्त हुए ऋषि

story of mahabharat satyavati

मत्स्यगंधा जैसे-जैसे बड़ी होती गई उसका रूप यौवन निखरता चला गया। मछुआरे पिता ने मत्स्यगंधा को यात्रियों को नाव से यमुना पार कराने के काम पर लगा दिया। एक दिन ऋषि पराशर भी मत्स्यगंधा की नाव में बैठे और मत्यगंधा को देखकर मोहित हो गए।

ऋषि पराशर ने मत्स्यगंधा से प्रेम निवेदन किया और कहा कि मैं तुमसे एक पुत्र उत्पन्न करना चाहता हूं। मत्स्यगंधा ने कहा कि आप ऋषि हैं और मैं मछुआरे की बेटी ऐसे में हमारा मिलन कैसे संभव है। मत्स्यगंधा ने अपना कौमार्यभंग होने की बात भी ऋषि से कही।

ऋषि ने मत्स्यगंधा से कहा कि संतान उत्पन्न करने के बाद भी तुम कुंवारी ही रहोगी इसलिए चिंता मत करो। इसके बाद ऋषि पराशर ने अपने तपोबल से घना कोहरा फैला दिया और मत्स्यगंधा के साथ इनका मिलन हुआ।

इससे महर्षि व्यास का जन्म हुआ। ऋषि ने मत्स्यगंधा को आशीर्वाद दिया कि तुम्हारे शरीर से अब मछली की दुर्गंध नहीं आएगी बल्कि अब तुम्हारे अंगों से उत्तम सुंगध निकलेगी। इसके बाद से मत्स्यगंधा सत्यवती और गंधा के नाम से जानी गई।

मछली से कई मनुष्यों के जन्म होने की कई कथाएं हैं जिनका जिक्र किसी अन्य अंक में करेंगे।

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