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श्रीकृष्ण को क्यों जाना पड़ा द्वारका, जानें इस मंदिर की खासियत

Thu, 19 Dec 2019 02:20 PM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन, वास्तुविद
अनीता जैन, वास्तुविद Published by: विनोद शुक्ला Updated Thu, 19 Dec 2019 02:20 PM IST
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story of dwarkadhish temple
द्वारिकाधीश मंदिर में श्रीराधा-कृष्ण का शृंगार
अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवन्तिका।
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पुरी द्वारवती जैव सप्तैता मोक्षदायिका:॥


द्वारकाधीश मंदिर गुजरात के जामनगर ज़िले में गोमती नदी के तट पर द्वारका शहर में स्थित है। यह मंदिर द्वारका का मुख्य मंदिर है जिसे जगत मंदिर (ब्रह्मांड मंदिर) या रणछोड़राय मंदिर भी कहते हैं। यही गोमती द्वारका भी कहलाती है। भगवान विष्णु या उनके अवतार भगवान कृष्ण को समर्पित द्वारकाधीश मंदिर चार धाम रामेश्वरम,बद्रीनाथ,द्वारका और जगन्नाथ पुरी में से एक एवं मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में से एक है। 

द्वारकाधीश का मुख्य मंदिर लगभग 2500 वर्ष पुराना माना गया है ऐसा भी उल्लेख है कि महाभारत युद्ध के बाद जब द्वारका जहाँ पर भगवान कृष्ण का राज्य था, सागर में जलमग्न हो गई थी। लेकिन बाद में इस मंदिर का निर्माण भगवान कृष्ण के पड़पोते वज्रनाभ ने किया था। हिन्दू दृष्टा और धर्मगुरु शंकराचार्य ने भी इसके विस्तार और निर्माण में व्यापक योगदान दिया। इतिहास के पन्ने पलटने से पता लगा कि जगत मंदिर के आस-पास की संरचनाओं का निर्माण16 वीं शताब्दी और इसका नवीनीकरण19 वीं शताब्दी में हुआ था।श्री कृष्ण का यह मंदिर108 पवित्र विष्णु मंदिरों या दिव्यसेवसम में से एक है। दिव्यसेवसम पवित्र मंदिर विष्णु या कृष्ण को समर्पित मंदिर हैं,जिन्हें तमिल कवि संतों ने अपने गीतों में आलवार कहा था।
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श्री कृष्ण को जाना पड़ा द्वारका
  • द्वारका के उदभव के बारे में धर्मग्रंथों में लिखा है कि श्री कृष्ण ने मथुरा के घोर अत्याचारी राजा कंस का वध कर दिया। जिससे कुपित होकर कंस के ससुर मगधपति जरासंध ने कृष्ण और यादवों का कुलनाश करने की ठान ली थी। वह मथुरा और यादवों पर बार-बार आक्रमण करता रहा।अंततः यादवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए श्री कृष्ण ने मथुरा छोड़ने का निर्णय लिया।
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  • भगवान श्री कृष्ण ने द्वारकापुरी की स्थापना का निर्देश विश्वकर्मा को दिया,विश्वकर्मा ने एक ही रात में इस भव्य नगरी का निर्माण कर दिया।अपने समस्त यादव बंधुओं के साथ श्री कृष्ण द्वारका आकर निवास करने लगे। द्वारका को शास्त्रों में कुशस्थली भी कहा गया है।
  • ऐसी मान्यता है कि सतयुग में महाराजा रैवत ने समुद्र के मध्य की भूमि पर कुश बिछाकर कई यज्ञ किए थे। यहाँ कुश नाम का ही एक दानव जिसने बहुत उपद्रव फैला रखा था। ब्रह्माजी के अनेक प्रयासों के बाद भी जब वह दानव नहीं मरा तो त्रिविक्रम भगवान ने उसे भूमि में गाढ़कर उसके ऊपर उसी के आराध्य देव कुशेश्वर की लिंग मूर्ति स्थापित कर दी। दैत्य द्वारा प्रार्थना करने पर भगवान ने उसे वरदान दिया कि द्वारका आने वाला जो व्यक्ति कुशेश्वर के दर्शन नहीं करेगा उसका आधा पुण्य उस दैत्य को मिलेगा ।
  • श्री कृष्ण ने द्वारका में 36 वर्ष तक शासन किया। जब श्री कृष्ण ने वैकुंठ प्रस्थान किया तो द्वारका नगरी समुद्र में स्वतः ही डूब गई, केवल कृष्ण का मूल मंदिर ही बचा रहा। कुछ वर्षों पहले नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ असियनोग्राफी  को समुद्र के अंदर प्राचीन द्वारका के अवशेष प्राप्त हुए थे। श्री कृष्ण की द्वारका नगरी की दीवारें आज भी समुद्र के गर्त में मौजूद हैं।

अद्भुत है द्वारकाधीश मंदिर
  • चूना-पत्थर से बना हुआ सात मंज़िला द्वारकाधीश मंदिर जिसकी ऊंचाई करीब157 फ़ीट है। बाहरी दीवारों पर सजावट कृष्ण की जीवन लीलाओं का चित्रण करते हुए की गई है।आंतरिक भाग साधारण और सौम्य है।मंदिर के दो प्रवेश द्वार हैं जो दक्षिण में है उसे स्वर्ग द्वार कहा जाता है तीर्थ यात्री आमतौर पर इसी द्वार के माध्यम से मंदिर में प्रवेश करते हैं।
  • उत्तर की तरफ जो द्वार है उसे मोक्ष द्वार कहा जाता है यह द्वार गोमती नदी के 56 तटों की ओर ले जाता है।अंदर मंदिर में द्वारकाधीश जी की श्यामवर्ण चतुर्भुज मूर्ति विराजमान है।भगवान ने हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किए हैं। बहुमूल्य अलंकरणों तथा सुंदर वेशभूषा से सजी प्रतिमा हर किसी का मन मोह लेती है।
  •  इस मंदिर का शिखर 43 मीटर ऊँचा है जिसके ऊपर एक बड़ा ध्वज लगा हुआ है जिस पर सूर्य और चन्द्रमा बने हुए हैं।यह विश्व की सबसे बड़ी ध्वजा है जिसे10 कि.मी.की दूरी से भी देखा जा सकता है।यह ध्वजा दिन में तीन बार बदली जाती है।इस अवसर पर ढोल-नगाड़ों की गूँज के साथ यहाँ का माहौल अत्यंत आध्यात्मिक एवं उत्सवी हो जाता है।
  • मंदिर के दक्षिण में भगवान त्रिविक्रम का मंदिर है इसमें राजा बलि तथा सनकादि चारों कुमारों की मूर्तियों के साथ-साथ गरुड़ जी की मूर्ति भी विराजमान है।मंदिर के उत्तर में प्रधुम्न जी की प्रतिमा और उसके पास ही अनिरुद्ध व बलदेव जी की मूर्तियां भी हैं।
  • मंदिर की पूर्व दिशा में दुर्वासा ऋषि का मंदिर है।मंदिर के पूर्वी घेरे के भीतर ही मंदिर का भण्डार है और उसके दक्षिण में जगत गुरु शंकराचार्य का शारदा मठ है।उत्तरी मोक्ष द्वार के निकट कुशेश्वर शिव मंदिर है यहाँ के दर्शन किए बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है।
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