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Prayagraj Kumbh 2019 - बूंद-बूंद में कुंभ
Sun, 06 Jan 2019 12:32 PM IST
Ayush Jha
इंदुशेखर पंचोली
इंदुशेखर पंचोली
Published by: Ayush Jha
Updated Sun, 06 Jan 2019 12:32 PM IST
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प्रयागराज कुंभ 2019
बुजुर्ग कहते हैं कि आस्था के इस महापर्व में आना है, तो सब कुछ पीछे छोड़ आएं- तर्क-वितर्क, ज्ञान-अज्ञान, कला-विज्ञान, दुख-सुख, राग-विराग... सब कुछ। जिसने सब कुछ पीछे छोड़ दिया, वही अमृत की धार में डुबकी लगा पाया। जो खाली होकर आएगा, वही यहां से भरकर ले जा पाता है।
कुंभ देश का विराट सांस्कृतिक आयोजन है। इस बार प्रयागराज का कुंभ कई मायनों में अद्भुत है। सरकारी प्रयत्नों से इसका आकार तो बढ़ा ही है, इंतजाम भी भव्य हुए हैं। आस्था एवं विश्वास का यह ऐसा समागम है, जिसके लिए किसी को औपचारिक आमंत्रण नहीं जाता, फिर भी जनसैलाब उमड़ता है। सिंह राशि में सूर्य आते ही कुंभ जुड़ने लगेगा और महाशिवरात्रि तक जीवन का सर्वोच्च पुण्य-लाभ मानकर दस से बारह करोड़ व्यक्ति गंगा में डुबकी लगा लेंगे। क्या यह महज स्नान का जुटाव है? भारत में मान्यता है-शतं विहाय भोक्तव्यम्-सहस्रं विहाय स्नातव्यम्। स्नान का इतना महत्व दुनिया के किसी देश में नहीं है। देश की सात नदियों और सात पर्वतों को परिवार का सदस्य माना गया है। सृष्टि के प्रति ऐसी उदात्त भावना भारत-भूमि में ही संभव है। यह इसका भी प्रतीक है कि देश में पर्यावरण के प्रति चेतना लोक में कैसे व्याप्त रही है।
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कुंभ देश का विराट सांस्कृतिक आयोजन है। इस बार प्रयागराज का कुंभ कई मायनों में अद्भुत है। सरकारी प्रयत्नों से इसका आकार तो बढ़ा ही है, इंतजाम भी भव्य हुए हैं। आस्था एवं विश्वास का यह ऐसा समागम है, जिसके लिए किसी को औपचारिक आमंत्रण नहीं जाता, फिर भी जनसैलाब उमड़ता है। सिंह राशि में सूर्य आते ही कुंभ जुड़ने लगेगा और महाशिवरात्रि तक जीवन का सर्वोच्च पुण्य-लाभ मानकर दस से बारह करोड़ व्यक्ति गंगा में डुबकी लगा लेंगे। क्या यह महज स्नान का जुटाव है? भारत में मान्यता है-शतं विहाय भोक्तव्यम्-सहस्रं विहाय स्नातव्यम्। स्नान का इतना महत्व दुनिया के किसी देश में नहीं है। देश की सात नदियों और सात पर्वतों को परिवार का सदस्य माना गया है। सृष्टि के प्रति ऐसी उदात्त भावना भारत-भूमि में ही संभव है। यह इसका भी प्रतीक है कि देश में पर्यावरण के प्रति चेतना लोक में कैसे व्याप्त रही है।
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Prayagraj Kumbh 2019
तन ही नहीं मन भी हो पवित्र
मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय अमृत और कालकूट विष एक साथ प्रकट हुए। विष का पान करके शिव नीलकंठ बन गए। अमृत घट राक्षसों से बचाकर जहां-जहां रखे गए, वहां कुंभ समागम होने लगे। स्नान से शरीर पवित्र होता है। लेकिन, मन-चित्त की पवित्रता भी उतनी ही आवश्यक होती है।
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कुंभ मेला 2019
लहरा उठी धर्म ध्वजा
कबीर ने सही कहा है कि यदि स्नान करने मात्र से पुण्य और मुक्ति मिलती है, तो सबसे पहले जल की मछलियों को मुक्ति मिलनी चाहिए। स्नान से शरीर पवित्र होता है, जीवन में ताजगी भी आती है। उस ताजगी-युक्त स्वस्थ शरीर में मन भी पवित्र होता है। हरिद्वार, उज्जयिनी, नासिक और प्रयागराज में प्रति 12 वर्षों में कुंभ समागम होता है। इस दृष्टि से प्रयागराज का यह कुंभ, अर्द्धकुंभ है। लेकिन, विराट आयोजन ने इसका महत्व बढ़ा दिया है। व्यवस्था एवं अनुशासन, दोनों दृष्टि से कुंभ वैसे भी बेजोड़ रहते हैं। प्रयागराज में कुंभ का झंडा फहरा दिया गया है। संतों के समुदाय आने लगे हैं। भारत के साथ 71 देशों के झंडे भी इस महापर्व के साक्षी बने हैं। विश्व में सौ से अधिक देशों में भारतीय रहते हैं। भारत के सांस्कृतिक संबंधों को प्रयागराज का कुंभ नई गति प्रदान करेगा, ऐसा मान सकते हैं।
कबीर ने सही कहा है कि यदि स्नान करने मात्र से पुण्य और मुक्ति मिलती है, तो सबसे पहले जल की मछलियों को मुक्ति मिलनी चाहिए। स्नान से शरीर पवित्र होता है, जीवन में ताजगी भी आती है। उस ताजगी-युक्त स्वस्थ शरीर में मन भी पवित्र होता है। हरिद्वार, उज्जयिनी, नासिक और प्रयागराज में प्रति 12 वर्षों में कुंभ समागम होता है। इस दृष्टि से प्रयागराज का यह कुंभ, अर्द्धकुंभ है। लेकिन, विराट आयोजन ने इसका महत्व बढ़ा दिया है। व्यवस्था एवं अनुशासन, दोनों दृष्टि से कुंभ वैसे भी बेजोड़ रहते हैं। प्रयागराज में कुंभ का झंडा फहरा दिया गया है। संतों के समुदाय आने लगे हैं। भारत के साथ 71 देशों के झंडे भी इस महापर्व के साक्षी बने हैं। विश्व में सौ से अधिक देशों में भारतीय रहते हैं। भारत के सांस्कृतिक संबंधों को प्रयागराज का कुंभ नई गति प्रदान करेगा, ऐसा मान सकते हैं।
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घट-घट में ब्रह्म
मानव जाति के विकास में समुद्र मंथन की घटना की बड़ी अहमियत है। समुद्र मंथन देवों और दानवों ने अपनी-अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया था। शरीरवाची कुंभ के साथ घट एवं कलश शब्द भी प्रचलन में हैं। शरीर भी घट ही माना गया है। बांग्ला कहावत है, घटे-घटे एकै ब्रह्म, घाटे-घाटे गंगा’र पानी। घाट-घाट पर गंगा का पानी हो जाता है, जब वहां घट एकत्र होते हैं। और ये इकट्ठे होते हैं, एक ब्रह्म के साक्षात् दर्शन के लिए। बूंद-बूंद में कुंभ समाबहत हो जाता है। भारतीय पंरपरा मानती है कि घट-घट में ब्रह्म की व्याप्ति है। उसी के प्रत्यक्ष दर्शन के लिए कुंभ समागम है। भेदभाव, ऊंच-नीच, राग-विराग, ज्ञान-अज्ञान, जाति-धर्म, सुख-दुख-सबसे दूर, मानवमात्र की कल्याण की कामना कुंभ का उत्कृष्ट है।
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आध्यात्मिक अनुभूति का महापर्व
शरीर भी अमृत-घट है। देव-असुर संग्राम यहां भी चलता है। अमृत मंथन शरीर में भी होता है। संध्यावंदन और अग्निहोत्र में सत्य, यश और श्री की साधना का हेतु यही है। इसीलिए आत्मा को अमृतस्वरूप माना जाता है। वेद में कहा गया है, शृण्वंतु विश्वे अमृतस्य पुत्रा:। कुंभ, इस अर्थ में अमृत-कुंभों का उत्सव है। जहां सर्वोच्च पुण्य-लाभ के लिए स्नान के साथ मां गंगा को प्रणाम करके सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। यह प्रतीक है कि मानवों में एक ही ब्रह्म या चेतना का वास है। जो भेदभाव दिखते या दिखाए जाते हैं, वह कृत्रिम या छद्म हैं। कुंभ इस चेतना की अनुभूति का महापर्व है।
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