यही वह गांव है जहां देवी सीता ने गुजारे थे अपने अंतिम दिन
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भगवान राम के जन्मदिवस के ठीक एक महीने बाद वैशाख शुक्ल नवमी के दिन देवी सीता का जन्म हुआ था। इस दिवस को सीता नवमी के नाम से जाना जाता है। देवी सीता का जन्म जिस प्रकार रहस्य माना जाता है उसी प्रकार यह भी रहस्य है कि देवी सीता का अंतिम समय कैसा और कहां बीता।
लक्ष्मण जी ने सीता को यहां छोड़ दिया
ऐसी मान्यता है कि जब राम ने धोबी के कहने पर सीता को वनवास दे दिया तो लक्ष्मण जी ने सीता को उत्तराखंड की देवभूमि में छोड़कर आने के लिए कहा था। राम की आज्ञा का पालन करते हुए लक्ष्मण जी ने सीता को देव प्रयाग से चार किलोमीटर आगे छोड़ा था। यह स्थान पुराने बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित है।
इस स्थान को 'सीता विदा' गांव के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर सीता को छोड़ने का कारण यह था कि जब धरती पर गंगा उतरी तब सबसे पहले यहीं प्रकट हुई थी। गंगा के साथ उस समय 33 करोड़ देवता भी यहां एकत्रित हुए थे। यह तपस्वियों की भूमि थी जिससे इस स्थान पर पाप का प्रभाव नहीं था।
यहां से सीता बाल्मिकी आश्रम चली गयी
सीता जी ने यहां पर अपनी कुटिया बनायी थी जिसे सीता कुटि और सीता सैंण के नाम से जाना जाता है। यहां से सीता बाल्मिकी आश्रम चली गयी जो वर्तमान में कोट महादेव मंदिर के पास है। केदारखंड नामक ग्रंथ में उल्लेख आया है कि कुछ समय तक राज-काज देखने के बाद भगवान राम और लक्ष्मण देवप्रयाग आये थे।
यहां पर राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ रावण वध के कारण लगे ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए तपस्या और विश्वेश्वर लिंग की स्थापना की। भगवान राम प्रतिदिन देवप्रयाग से आगे श्रीनगर नामक स्थान में सहस्र कमल फूल से कमलेश्वर महादेव की पूजा किया करते थे।