भीष्म पितामह ने शरीर त्यागने के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा क्यों की? जानें उत्तरायण का महत्व
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीय संस्कृति में एक वर्ष को दो भागों में विभक्त किया गया है, जिन्हें हम दक्षिणायन एवं उत्तरायण के रूप में जानते हैं। इन्हें याम्यायन एवं सौम्यायन के नाम से भी जाना जाता है। अर्थात दक्षिणायन को याम्यायन एवं उत्तरायण को सौम्यायन कहते हैं। दक्षिणायन काल के व्यतीत हो जाने के उपरांत उत्तरायण का समय प्रारंभ होता है। उत्तरायण का प्रारंभ मकर संक्रांति से होता है। अर्थात सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है, तभी से उत्तरायण प्रारंभ हो जाता है। संक्रांति शब्द का अर्थ होता है, सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना।
सूर्य के उत्तरायण का महत्व
उत्तरायण को दक्षिणायन से श्रेष्ठ माना गया है। सूर्य का उत्तरायण में पदार्पण प्रत्येक जन को प्राणहारी ठंड की समाप्ति एवं प्रत्यासन्न वसंत ऋतु के आगमन का शुभ संदेश देता है। इसमें दिन बड़े होने लगते हैं और प्रकाश एवं प्राणदायिनी ऊष्मा की वृद्धि होने लगती है। विविध प्रकार के काम्यानुष्ठानों एवं सुमुर्हूतों का प्रभूत दिग्दर्शन होता है। श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय के चौबीसवें श्लोक में कहा गया है-
''अग्निज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः।।''
इस श्लोक में उत्तरायण को शुक्ल मार्ग से संबोधित किया गया है। शुक्ल मार्ग यानी प्रकाश की बहुलता वाला मार्ग। नाम के अनुसार प्रकाश की बहुलता वाले मार्ग में यात्रा शुभदायक होती है, इसके विपरीत कृष्ण मार्ग यानी अंधकार की बहुलता वाला मार्ग होता है। अंधकार की बहुलता वाले मार्ग की यात्रा संघर्षपूर्ण होती है। मानवीय प्रवृत्ति के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति सुगम मार्गानुगामी बनना चाहता है। अतः शुक्ल मार्ग ही श्रेयष्कर है, ऐसा विचार सामान्य जन मानस के अंतस में उद्भूत होता है।
कहा भी गया है कि प्रकाश की बहुलता वाले मार्ग से यात्रा करने वाले पथिक ज्योतिः स्वरूप अग्नि देवता के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। वहां से वे दिन के देवता के अधिकार क्षेत्र में जाकर शुक्लपक्ष के अधिपति देवता को समर्पित होते हैं। वहां से उत्तरायण के अधिपति देवता के क्षेत्र से वे सभी पथिक ब्रह्मलोक को प्राप्त हो जाते हैं। वहां वे ब्रह्माजी की आयु तक रहकर महाप्रलय से मुक्त होकर सच्चिदानंद परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं। यहां ब्रह्विद् शब्द परमात्मा को परोक्ष रूप से जानने वालों का वाचक है, अपरोक्ष रूप से अनुभवी ब्रह्मज्ञानियों के लिए नहीं, क्योंकि ब्रह्मज्ञानी तो यहीं मुक्त हो जाते हैं, उनको ब्रह्मलोक जाना ही नहीं पड़ता है।
सामान्यतः हम लोगों में यह धारणा है कि जो दिन में, शुक्लपक्ष में और उत्तरायण में अपना देह त्याग करते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं, लेकिन रात में, कृष्णपक्ष में एवं दक्षिणायन में जो अपना शरीर त्यागते हैं, वे मुक्त नहीं होते हैं। यह धारणा ठीक नहीं है, क्योंकि गीता के ही चौदहवें अध्याय के अठ्ठारहवें श्लोक में तीन प्रकार की गतियों का वर्णन किया गया है, जिसे ऊर्ध्व, मध्य एवं अधोगति के रूप में जाना जाता है। यदि उत्तरायण में मरने वाले की ऊर्ध्वगति और दक्षिणायन में मरने वालों की अधोगति माना जाए, तो मध्य गति के लिए तो कोई बचा ही नहीं, फिर इसका तात्पर्य ही अनौचित्य हो जाएगा।
इस संदर्भ में महाभारत का एक आख्यान अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसमें कहा गया है कि जब भीष्म ने मकर समाप्त हो जाने के उपरांत उत्तरायण में माघ शुक्ल अष्टमी को अपने प्राणों का परित्याग किया। यहां यह प्रश्न उपस्थित होता है कि जब मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार ही गति पाता है, तो फिर भीष्म पितामह ने उत्तरायण का प्रतीक्षा क्यों किया?
इसका समाधान देते हुए आचार्यों ने बताया कि भीष्म भगवद् धाम नहीं गए थे। वे द्यौ नामक वसु थे। पौरोहित्य में आठ प्रकार के वसुओं की चर्चा सर्वविदित है। पुराणों में इसे अच्छे ढंग से समझाया गया है। इन आठ वसुओं में से एक थे भीष्म पितामह, जो श्राप के कारण मृत्युलोक में आए थे। उन्हें ब्रह्लोक में नहीं, देवलोक में जाना था। दक्षिणायन के समय देवलोक में रात्रि रहती है। यदि वे रात्रि में जाते तो उन्हें प्रातः होने की प्रतीक्षा वहां भी करनी ही पड़ती। वे इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त किए ही थे, इसलिए उन्होंने सोचा कि वहां प्रतीक्षा करने के बजाय यहीं प्रतीक्षा करना उचित रहेगा, क्योंकि यहां भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन होते रहेंगे और सत्संग भी होता रहेगा।
इसलिए भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, ''शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।'' यह शाश्वत मत है कि जगत का शुक्ल और कृष्ण दोनों मार्गों से संबंध है। तात्पर्य यह है कि ऊर्ध्वगति के साथ मनुष्य का तो साक्षात संबंध है और अन्य चर एवं अचर प्राणियों का परंपरा से संबंध है। इसका कारण है कि चर अचर प्राणी भगवत कृपा से मनुष्य की श्रेणियों में आते हैं और किए गए कर्मों के अनुसार ऊर्ध्वगति, मध्य गति एवं अधोगति की ओर जाते हैं। ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्वस्थाः कहते हुए सत्वगुण वालों की ऊर्ध्व गति, राजस गुण वालों की मध्य गति तथा तामस गुण वालों की अधोगति बताई गई है।
मृत्यु के संदर्भ में अंड एवं पिंड का सिद्धांत यह कहता है कि मृत्यु के समय यदि प्राणशक्ति का प्राबल्य हो तो वह जीवन मुक्त होता है, क्योंकि प्राणशक्ति का संबंध सूर्य पिंड से होता है। उत्तरायण में सूर्य के आकर्षण के कारण जीव ब्रह्मांड की परिधि से पार निकल जाता है और दक्षिणायन में चन्द्रशक्ति का प्राबल्य होने के कारण वह ब्रह्माण्ड की परिधि से बाहर पार नहीं जाता है, क्योंकि चन्द्रपिंड भू-पिंड के अत्यंत निकट होता है।
सूर्य का उत्तर एवं दक्षिण दिग्गमन ही अयन है। उत्तरदिशा की ओर सूर्य का गमन ही उत्तरायण है। उत्तरायण से देवताओं का ब्रह्म मुहूर्त प्रारंभ हो जाता है। उत्तरायण काल को शास्त्रकारों ने साधनाओं एवं परा अपरा विद्याओं की प्राप्ति के लिए सिद्धिदायक काल माना है।
ज्योतिषीय दृष्टि से गृह का निर्माण, देवताओं की प्रतिष्ठा, सकाम यज्ञ एवं अन्य किसी भी प्रकार के काम्य यज्ञ इस काल में किए जा सकते हैं। उत्तरायण यह संदेश देता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कृत कर्मों का चिंतन करे और उचित कर्म न प्रतीत होने पर उसमें परिवर्तन कर शुद्ध एवं सात्विक कर्मों के संपादन की ओर अपने को प्रवृत्त करे। शुद्ध आचरण एवं चिंतन व्यक्ति की उत्तरोत्तर अभिवृद्धि करता है और उसमें भी उत्तरायण हो, तो सोने पे सुहागा। अतः हम सभी को इस प्रकार का शुभ प्रयास करना चाहिए, क्योंकि हम सब उत्तर में हैं।