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Sawan 2023: भगवान शिव के त्रिशूल की नोक पर टिकी है काशी, विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन से मिलता है मोक्ष
Tue, 18 Jul 2023 12:34 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Tue, 18 Jul 2023 12:34 PM IST
सार
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्री काशी विश्वनाथ दो भागों में है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां पार्वती विराजमान हैं और दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप में विराजमान है। काशी अनंतकाल से बाबा विश्वनाथ के जयकारों से गूंज रही है।
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काशी विश्वनाथ धाम
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सनातन पंरपरा में द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन का बहुत ज्यादा धार्मिक महत्व है। पतित पावनी गंगा के तट पर देवताओं की नगरी काशी में श्रीविश्वनाथ शिवलिंग के रूप में साक्षात महादेव विराजते हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में इनका नौंवा स्थान है।
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त्रिशूल की नोक पर है काशी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्री काशी विश्वनाथ दो भागों में है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां पार्वती विराजमान हैं और दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप में विराजमान है। काशी अनंतकाल से बाबा विश्वनाथ के जयकारों से गूंज रही है। शिवभक्त यहां मोक्ष की कामना से आते हैं। यह भी माना गया है कि काशी नगरी शिवजी के त्रिशूल पर टिकी हुई है और जिस जगह ज्योतिर्लिंग स्थापित है, वह जगह कभी भी लोप नहीं होती। स्कन्द पुराण के अनुसार जो प्रलय में भी लय को प्राप्त नहीं होती, आकाश मंडल से देखने में ध्वज के आकार का प्रकाश पुंज दिखती है वह काशी अविनाशी है।
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मिलती है मुक्ति
सावन आते ही भगवान शिव के दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। कहा गया है-''काश्यां मरणांमुक्ति'' अर्थात काशी में देह त्यागने से मुक्ति मिल जाती है और प्राणी दोबारा गर्भ में नहीं आता। भगवान शिव खुद यहां तारक मन्त्र देकर भक्तों को तारते हैं।
खास है मंदिर का गुंबद
मंदिर के गुंबद में श्रीयंत्र लगा हुआ है और यहां के लोगों का विश्वास है कि इस गुंबद की तरफ देखकर जो भी मुराद मांगी जाती है वह बाबा विश्वनाथ की कृपा से अवश्य पूरी होती है । मंत्र साधना के लिए भी यह प्रमुख स्थान है।
कैसे बना ज्योतिर्लिंग
कल्पभेद के अनुसार विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में कई कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार जब भगवान शंकर पार्वती से विवाह करने के पश्चात कैलाश पर्वत पर रहने लगे तब पार्वती जी इस बात से नाराज़ रहने लगीं। उन्होंने अपने मन की इच्छा भगवान शिव के सम्मुख रख दी। माता पार्वती की यह बात सुनकर भगवान शिव कैलाश पर्वत को छोड़कर देवी पार्वती के साथ काशी नगरी में आकर रहने लगे। इस प्रकार भोलेनाथ काशीपुरी में आकर ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए स्थापित हो गए। तभी से काशी नगरी में विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग ही भगवान शिव का निवास स्थान बन गया। पांच कोस (पंचक्रोशी) के क्षेत्रफल वाले काशी क्षेत्र को शिव और पार्वती ने प्रलयकाल में भी कभी त्याग नहीं किया। यही वजह है कि यह क्षेत्र 'अविमुक्त' क्षेत्र कहा गया है। स्कन्द (कार्तिकेय) ने अगस्त्य जी को बताया कि यह काशी क्षेत्र भगवान शिव के आनंद के कारण है इसलिए इसे आनंदवन भी कहा जाता है।
दर्शन करने से मिलता है मोक्ष
काशीखण्ड में वर्णिंत है-' कि इस ज्योतिर्लिंग के स्पर्श मात्र से राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है और दर्शन मात्र से ज्ञान रूपी प्रकाश प्राप्त होता है। काशी में एक तिल भूमि भी लिंग से रहित नहीं है'। ऐसा भी माना गया है कि एक बार बाबा विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।