सर्वपितृ अमावस्या पर होगी पितरों की विदाई
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शास्त्र कहते हैं कि पित्रो वै देवः, पित्रो जनार्दन : पित्रो वै ब्रह्म ! अर्थात पितृ ही देव हैं, पितृ ही जनार्दन हैं, पितृ ही ब्रह्म हैं। वेद के अनुसार पितरों को वसुगण, पितामहों को रुद्र्गण और प्रपितामाहों को आदित्यगण कहा गया है ये सभी पितृ जगतगुरु श्रीविष्णु के ही अंश हैं। श्राद्ध पक्ष की अमावस्या तिथि को महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि पितृपक्ष के 16 दिनों के दौरान पितर धरती पर आते हैं और अमावस्या के दिन उनकी विदाई होती है। इस साल पितृमोक्ष अमावस्या 28 सितंबर को है। खास बात यह है कि पितृपक्ष में शनिवार के दिन अमावस्या होने पर इसे बहुत ही सौभाग्यशाली माना जाता है। 20 साल बाद सर्व पितृमोक्ष अमावस्या शनिवार के दिन रहेगी।
श्राद्ध के बारे में क्या कहता वेद
वेद कहते हैं कि सनातन सत्य है कि स्वयं नारायण ही पितृ है श्राद्ध करके हम परोक्ष रूप से नारायण की ही पूजा करते हैं। पितरों का नाम तथा गोत्र ही उनके उद्देश्य से दिए गये हव्य-कव्य आदि पदार्थों को पितरों के पास तक ले जाने वाला होता है अतिशय श्रद्दा तथा भक्ति के साथ मंत्रों का प्रयोग करके श्राद्ध कार्य में जो अन्नादि पदार्थ पितरों को व्यवस्थित रूप से नाम, गोत्र, काल, देश आदि का उच्चारण करके दिए जाते हैं वे सब पितरों के आहार रूप में परिणत हो जाते हैं और अन्यलोकों अथवा किसी भी योनि में जन्म लेने वाले आप के संबंधी जन को उनकी आवश्यकता अनुसार प्राप्त होते हैं। अगर आप के माता-पिता कहीं भी मानव योनि में जन्म ले चुके हैं तो आप द्वारा दिया गया श्रद्धा रूप श्राद्ध उन्हें इसी जन्म में अन्य भौतिक भोंगों के रूप में मिलता रहेगा। यही पितृगण प्रसन्न होकर आप को आयु, पुत्र, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्षसुख, और राज्यपद दिलाते हैं।
कथा
प्राचीनकाल में महर्षि विश्वामित्र के पुत्रों ने इसी श्राद्धकर्म के माहात्म्य से अपने पांच जन्मों के कर्मों से मुक्ति प्राप्त करके विष्णु भगवान के परमपद वैकुण्ठ को प्राप्त किया था। भगवान राम ने अपने पिता महाराज दशरथ का गुरु वशिष्ट के मार्गदर्शन में श्राद्ध तर्पण किया था। वर्ष में छियानबे दिन शास्त्रों ने श्राद्ध के लिए बताए हैं। जिनमे आश्विन कृष्ण पक्ष का महत्व सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसलिए श्राद्धकर्म करके अपने भाग्य को सजाया जा सकता है किन्तु ध्यान रहे श्राद्धकर्म में अटूट श्रद्धा का होना आवश्यक है क्योंकि ' श्रद्धा धर्मः परः सूक्ष्मः श्रद्धा यज्ञाहुतं तपः। श्रद्धा मोक्षश्च स्वर्गश्च श्रद्धा सर्वमिदं जगत्।। अर्थात-श्रद्धा परम सूक्ष्म धर्म है,श्रद्धा यज्ञ, श्रद्धा ही हवन, श्रद्धा ही तप, श्रद्धा ही स्वर्ग और मोक्ष है यह सम्पूर्ण जगत श्रद्धामय ही है श्रद्धा के बिना किया गया कार्य सफल नहीं होता, अतः मानव को श्रद्धा सम्पन होना चाहिए। तभी तो वेद भी कहते हैं, कि 'श्रद्धया दीयते यस्मात ततश्राद्धं ! पितरों के उद्देश्य से जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है वही श्राद्ध है।