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गर्भाधान के समय रखें इन बातों का ध्यान, होगी मनचाही संतान

Mon, 07 Jul 2014 01:06 PM IST
Updated Mon, 07 Jul 2014 01:06 PM IST
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विवाह के पश्चात हर दंपत्ति की चाहत होती है संतान पाने की। अगर आप भी ऐसा सोचते हैं तो जान लीजिए किस तरह मनचाही संतान प्राप्त कर सकते हैं।

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आमतौर पर यह माना जाता है कि बच्चे को जैसी परवरिश देंगे बच्चा वैसा ही बनेगा। लेकिन सिर्फ परवरिश से काम नहीं चलता है। बच्चे की अंदर ऐसे गुण भी होने चाहिए जो आपकी परवरिश के अनुसार उन्हें योग्य बनाने में सहायक हो।
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इसके लिए माता-पिता को गर्भाधान के समय ही यह तय कर लेना चाहिए कि कैसी संतान चाहिए। क्योंकि गर्भाधान के समय ही तय होने लगता है कि आपकी संतान कैसी होगी।

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समागल काल में स्त्री पुरूष की मनोभावना

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जातक तत्व, सारावली और नारद पुराण में बताया गया है कि गर्भाधान के समय माता-पिता की जैसी मनोदशा होती है संतान भी उसी अनुरूप होती है।

सारावली के अनुसार 'मिथुनस्य मनोभावो तादृड‍्.मद लालसं भवति। श्लेष्मादिभिः स्वदोषैस्ततुल्य गुणो निषिक्तः स्यात्।। यानी समागल काल में स्त्री पुरूष की जैसी मनोभावना होती है, वैसे ही संतान की प्राप्ति होती है।


गर्भाधान से पूर्व इन बातों का भी रखें ध्यान

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शास्त्रों के अनुसार स्त्री पुरूष की जब संतान प्राप्ति की इच्छा हो तब कम से कम 10 से 15 दिनों तक ब्रह्मचर्य का पालन करें। मन में सात्विक भाव बनाएं रखें। परनिंदा, क्रोध, तामसिक भोजन से बचें। इन दिनों पौष्टिक और सात्विक भोजन लें एवं ईश्वर का ध्यान करें।

क्योंकि आपकी भावना जैसी होगी उसी अनुरूप आपकी संतान होगी। शास्त्रों में यहां तक कहा गया है कि समागम के समय स्त्री पुरूष में कफ, वात और पित्त जिसकी वृद्घि होती है होने वाली संतान पर उसका प्रभाव अधिक होता है।

इसलिए समागम के समय जैसी संतान आपको चाहिए उसका ध्यान मन में बनाए रखना चाहिए।

गर्भाधान के समय इन बातों से बचें

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शास्त्रों का मत है कि सुयोग्य संतान की प्राप्त की चाहत रखने वालों को ऋतुकाल की चार रात्रि और ग्यारहवी एवं तेरहवी रात्रि को समागम से बचना चाहिए। दिन के समय समागम भी उचित नहीं है।

इसके अलावा संध्या के समय, अमावस, कृष्ण चतुर्दशी, संक्रांति, माता/पिता की मृत्यु तिथि, ग्रहण, व्यतीपात योग, दशहरा, दीपावाली एवं गंडमूल नक्षत्रों में गर्भाधान नहीं करना चाहिए।

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