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उत्तर रामायण: जानें भगवान श्रीराम ने किस अपराध के लिए भाई लक्ष्मण को दिया था प्राण दंड
Wed, 20 May 2020 08:30 AM IST
रुस्तम राणा
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: रुस्तम राणा
Updated Wed, 20 May 2020 08:30 AM IST
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रामायण
- फोटो : सागर आर्ट्स
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भगवान श्रीराम के द्वारा स्थापित किए गए उच्च आदर्श हम सबके लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनका व्यक्तित्व महान था। अपने इन्हीं उच्च आदर्शों के कारण उनका नाम मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम पड़ा। उन्होंने वचन, कर्तव्य, मर्यादा इन शब्दों को अपने जीवन में उतारकर उन्हें चरितार्थ किया। भगवान श्रीराम ने अपने वचन को सिद्ध करने के लिए अपने प्राणों से प्रिय भाई लक्ष्मण तक को मृत्युदंड का आदेश दे दिया था। इसका प्रसंग उत्तर रामायण में मिलता है।
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दरअसल एकबार स्वयं काल के देव यमराज मुनि वेश धारण कर भगवान श्रीराम के दरबार पहुंचे। उन्होंने भगवान श्रीराम से अकेले में वार्तालाप करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, मैं आपसे एक वचन मांगता हूं कि जब तक मेरे और आपके बीच वार्तालाप चले तो हमारे बीच कोई नहीं आएगा और जो आएगा, उसको आपको मृत्युदंड देना पड़ेगा। भगवान राम ने यम को वचन दे दिया।
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भगवान राम ने भाई लक्ष्मण को यह कहते हुए द्वारपाल नियुक्त कर दिया कि जब तक उनकी और यम की बात हो रही है वो किसी को भी अंदर न आने दें, अन्यथा उसे उन्हें मृत्युदंड देना पड़ेगा। लक्ष्मण भाई की आज्ञा मानकर द्वारपाल बनकर खड़े हो गए।
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उधर, इस बीच अयोध्या के राजमहल में ऋषि दर्वासा आ जाते हैं। वे श्रीराम से तत्काल भेंट करने के लिए लक्ष्मण से कहते हैं। लेकिन लक्ष्मण ऋषि से कहते हैं कि प्रभु राम अभी किसी से विशेष वार्तालाप कर रहे हैं। वे अभी तत्काल नहीं मिल सकते। आप दो घड़ी विश्राम कर लीजिए फिर मैं आपकी सूचना उन तक पहुंचा दूंगा।
यह सुनकर ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गए और उन्होंने संपूर्ण अयोध्या को भस्म करने को कह दिया। फिर क्या था, लक्ष्मण ने अपनी अयोध्या नगरी को बचाने के लिए अपने प्राणों की परवाह नहीं की और यम और प्रभु श्रीराम के पास चले गए। उन्होंने प्रभु श्रीराम को ऋषि दुर्वासा के आगमन की सूचना दी।
राम भगवान ने शीघ्रता से यम के साथ अपनी वार्तालाप समाप्त कर ऋषि दुर्वासा की आव-भगत की। परन्तु अब श्री राम दुविधा में पड़ गए क्योंकि उन्हें अपने वचन के अनुसार लक्ष्मण को मृत्यु दंड देना था। वो समझ नहीं पा रहे थे कि वे अपने भाई को मृत्युदंड कैसे दे, लेकिन उन्होंने यम को वचन दिया था जिसे निभाना ही था।
इस दुविधा की स्थिति में श्री राम ने अपने गुरु का स्मरण किया और कोई रास्ता दिखाने को कहा। गुरु देव ने कहा कि अपने किसी प्रिय का त्याग, उसकी मृत्यु के समान ही है। अतः तुम अपने वचन का पालन करने के लिए लक्ष्मण का त्याग कर दो। भगवान श्रीराम ने अपने वचन का पालन करते हुए अपने पुत्र समान भाई का त्याग कर दिया। श्रीराम के त्यागने के बाद लक्ष्मण ने जल समाधि लेकर अपनी जीवन लीला को समाप्त कर दिया।