नवरात्र में कब कौन सी देवी की पूजा से मिलेगा लाभ
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नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी की दुर्गा के रूप में पूजा की जाती है। दुर्गा अर्थात पर्वत। आमतौर पर किसी मुश्किल कार्य को पहाड़ के समान बताया जाता है। पर दुर्गा की उपस्थिति में नकारात्मक शक्तियां क्षीण होने लगती हैं। विभिन्न मुसीबतें दुर्गा की उपस्थिति में ठहर नहीं पाती हैं। देवी दुर्गा को शेर की सवारी करते हुए दिखाया गया है जो कि देवी दुर्गा के साहस और निर्भीकता का प्रतीक है।
नव दुर्गा अर्थात देवी के नौ स्वरूप दैवी उर्जा का प्रतीक हैं। यह उर्जा नकारात्मक शक्तियों को पास आने से रोकती है और एक दीवार की भांति कार्य करती है। जब आप मुसीबत में होते हैं या आप मानसिक रूप से बंधन महसूस करते हैं तो आप देवी की विभिन्न योग्यताओं को याद कर विभिन्न मानसिक बंधनों से आजाद हो सकते हैं।
खासतौर पर जो लोग चिंता, स्वयं पर शक करना, स्वयं की योग्यता पर शक करना, स्वयं में चेतना की कमी महसूस करना, नकारात्मकता व दुश्मनी का खतरा महसूस करते हैं। देवी के विभिन्न नामों का गान उनकी चेतना को ऊपर उठाता है और निर्भीक एवं आत्म केंद्रित बनाता है।
पहले तीन दिन करें देवी के इस रूप की पूजा
देवी दुर्गा को महिशासुरमर्दिनी कहा गया है। महिशा यानी भैंस आलस्य, सुस्ती और जड़ता का प्रतीक है। किसी भी व्यक्ति में इन चीजों की उपस्थिति से उसकी आध्यात्मिक एवं भौतिक उन्नति में रूकावट पड़ती है।
देवी सकारात्मक उर्जा का भंडार है और उनकी उपस्थिति में किसी भी प्रकार का आलस्य, जड़ता व सुस्ती नष्ट हो जाती है। जो किसी भी मनुष्य की उन्नति के लिए बेहद जरूरी है।
मां के इस रूप की पूजा से धन वृद्घि
नवरात्रे के अगले तीन दिन अर्थात चैथा, पांचवा और छठा दिन देवी को लक्ष्मी के तौर पर पूजा जाता है। लक्ष्मी धन व वैभव की देवी है।
धन हमारे जीवन के रखरखाव व प्रगति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। पर यहां धन से अभिप्राय केवल मात्र रूपए, पैसे से ही नहीं है बल्कि ज्ञान, कौशल और प्रतिभा का प्रचूरता में होना है।
लक्ष्मी वह उर्जा है जो कि आध्यात्मिक व भौतिक उर्जा के रूप में किसी भी व्यक्ति में प्रकट होती है।
अंतिम तीन करें देवी के इस रूप की पूजा
नवरात्रे के अंतिम तीन दिन मां सरस्वती को समर्पित हैं। सरस्वती ज्ञान की देवी है-अर्थात वह शक्ति जो स्वयं के सार को बताती है। मां सरस्वती को हमेशा चट्टान पर बैठे दिखाया जाता है।
ज्ञान भी एक चट्टान की भांति है जिसका सहारा हमें सदैव मिलता है। यह हमारे साथ सदैव रहता है। मां सरस्वती वीणा बजाती हैं जिसके मधुर नोट मन में शांति और सद्भावना लाते हैं। इसी प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान जीवन में आराम और उत्सव की भांति होता है।
मां सरस्वती, समझ व चेतना के उस समुद्र के समान है जो सीखने के दौरान आने वाली विभिन्न परिस्थितियों के दौरान कंपित होता है। वह आध्यात्मिक प्रकाश का स्त्रोत है जो कि सभी प्रकार के अज्ञान को मिटाता है और ज्ञान का प्रसार करता है।