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Mirabai jayanti 2021: इस दिन है मीराबाई जयंती, जानिए कैसे मीरा हुई कृष्ण के प्रेम में लीन

Thu, 30 Sep 2021 06:20 PM IST
शशि सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: शशि सिंह Updated Thu, 30 Sep 2021 06:20 PM IST
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meerabai jayanti 2021 date important things about mirabai life and know Know how Mirabai became a devotee of Krishna
मीराबाई जयंती 2021 - फोटो : wikimedia

भगवान श्री कृष्ण के भक्तों में मीराबाई का उच्च स्थान है। उन्होंने स्वंय को पूरी तरह से कृष्ण भक्ति में लीन कर लिया था। वैसे तो इनके जन्म समय का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिलता लेकिन इनका जन्म 1448 के लगभग माना जाता है। प्रत्येक वर्ष अश्विन मास की शरद पूर्णिमा को मीराबाई जयंती के रुप में मनाया जाता है। इस बार मीराबाई जयंती 20 अक्टूबर 2021 दिन बुधवार को पड़ रही है। मीराबाई बचपन से ही भगवान कृष्ण की भक्ति में रम गई थी और अपने पूरे जीवन काल में भगवान कृष्ण की भक्ति करती रहीं। आज भी मीराबाई की भक्ति के किस्से लोगों के याद रहते हैं। इन्होंने कृष्ण भक्ति में कई भजनों और दोहों की रचना भी की जो आज भी लोकप्रिय हैं। तो चलिए जानते हैं कि कैसे मीराबाई हुई कृष्ण प्रेम में लीन और कैसा रहा उनका भक्ति सफर।

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कैसे बालपन से ही मीरबाई बनी कृष्ण भक्त-

मीराबाई के कृष्ण भक्त बनने के पीछे एक कथा मिलती है, जिसके अनुसार एक समय की बात है जब उनके पड़ोस में किसी धनवान व्यक्ति के यहां बारात आई थी। उस समय मीराबाई बाल्यकाल की अवस्था में ही थी। सभी स्त्रियां छत पर खड़ी होकर बारात देख रही थीं। मीराबाई भी बारात देखने के लिए छत पर आ गईं बारात को देख मीरा ने अपनी माता से पूछा कि मेरा दूल्हा कौन है इस पर मीराबाई की माता ने उपहास में ही भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति की तरफ इशारा करते हुए कह दिया कि यही तुम्हारे वर हैं, यह बात मीराबाई के बालमन में एक गांठ की तरह समा गई और वे कृष्ण को ही अपना पति मानने लगी।  

मीराबाई का जीवन

मीराबाई जोधपुर, राजस्थान के मेड़वा राजकुल की राजकुमारी थी। ये अपने पिता रतन सिंह की एकमात्र संतान थी। मीराबाई जब छोटी थीं तो उनकी मां का देहांत हो गया, इसके बाद उनके दादा राव दूदा उन्हें मेड़ता ले आए और यहीं पर उनकी देख-रेख में मीराबाई का पालन-पोषण हुआ। मीराबाई का मन बचपन से ही कृष्ण-भक्ति में रम गया था। इन्होंने बालपन से ही अपने मन में कृष्ण की छवि को बसा लिया था और बचपन से युवावस्था व बाकी पूरे जीवन भर उन्हें ही अपना सबकुछ मानकर उनकी भक्ति में लीन रहीं। मीराबाई ने कृष्ण को ही अपने पति के रुप में स्वीकार लिया था इसलिए वे विवाह नहीं करना चाहती थी, इसके बाद उनकी इच्छा के विरुद्ध राजकुमार भोजराज के साथ उनका विवाह कर दिया गया।
 

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पति की मृत्यु के बाद और ज्यादा बढ़ गई मीरा की कृष्ण भक्ति
मीराबाई के विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति का देहांत हो गया जिसके बाद वे और भी ज्यादा कृष्ण भक्ति में लीन होती चली गईं। मीराबाई को उनके पति के साथ सती करना चाहा लेकिन वे इसके लिए नहीं मानी क्योंकि वे कृष्ण को अपना स्वामी मानती थी। कहा जाता है कि इसी कारण उन्होंने अपना श्रंगार भी नहीं उतारा। इसके बाद मीराबाई की अनुपस्थिति में ही उनके पति का अंतिमसंस्कार किया गया।

मीराबाई के पति का देहांत होने के बाद उनकी भक्ति दिनों-दिन बढ़ती चली गई। वे मदिर में जाकर इतनी लीन हो जाती थी कि श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने घंटो तक नाचती रहती थी। इसी कारण मीराबाई की कृष्ण भक्ति उनके पति के परिवार को अच्छी नहीं लगती थी। इसलिए उन्हें कई बार मारने का प्रयास भी किया गया कभी विष  देकर तो कभी जहरीले सांप के द्वारा। परंतु श्रीकृष्ण की कृपा से मीराबाई को कुछ नहीं हुआ।  

कृष्ण की मूर्ति में समा गई मीराबाई
मीराबाई के मारने का प्रयास किया, इसके बाद वे वृंदावन और फिर वहां से द्वारिका चली आई। इसके बाद वे साधु-संतो के साथ रहने लगी व कृष्ण की भक्ति में रमी रहीं। मीराबाई की मृत्यु के विषय में कहा जाता है कि उन्होंने जीवन भर भगवान कृष्ण की भक्ति की और अंत समय में भी वे भक्ति करते हुए कृष्ण की मूर्ति में समा गई थी। 
 

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