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Prayagraj Kumbh 2019 : जानें कब शुरू हुआ कुंभ और कैसा रहा है इसका इतिहास

Sun, 06 Jan 2019 04:03 PM IST
Madhukar Mishra ज्योतिर्मय
ज्योतिर्मय Published by: Madhukar Mishra Updated Sun, 06 Jan 2019 04:03 PM IST
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know the history of kumbh mela in hindi
Prayagraj Kumbh 2019
कुंभ के बारे में कुछ कथाएं बहुत प्रचलित हैं। सबसे ज्यादा प्रचलित कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन की है, जिसमें अमृत निकलता है। उसे झपटने के लिए देव-दानवों में खींचतान मचती है और अमृत की कुछ बूंदें छलक जाती है। एक कथा के अनुसार, देवता और दैत्यों के युद्ध में महर्षि दुर्वासा के शापवश इंद्र समेत उनके सैनिक (देवता) दैत्यों से हार जाते हैं। विष्णु की सलाह पर सागर मंथन होता है और अमृत कुंभ के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा। इस मार-काट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूंदें गिरी थीं। कथा कहती है कि सूर्य चंद्रादि ग्रहों ने जिन राशियों में रहते हुए अमृत की रक्षा की थी, उस समय कुंभ का योग होता है। अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहां-जहां अमृत बूंद गिरी थी, वहां-वहां कुंभ पर्व होता है। 
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क्या कहते हैं इतिहासकार
यह तो हुए पौराणिक संदर्भ, ऐतिहासिक तथ्य कुंभ पर्व को डेढ़ से दो ढाई हजार साल पहले शुरू होने की गवाही देते हैं। इससे पहले कुंभ या किसी तरह के बड़े आयोजनों का उल्लेख देखने में नहीं आया। बुद्ध से पहले (छठी सदी ई.पू) नदी मेलों का जिक्र आता है। प्रसिद्ध इतिहासकार एस बी रॉय ने नदी में स्नान का जिक्र किया है। लेकिन इस तरह के आयोजनों में ज्यादा से ज्यादा कुछ सौ लोग ही शामिल होते थे। बुद्ध के समय में आख्यानों, देशनाओं और संगीतियों के प्रसंग आए हैं पर इस तरह के आयोजनों में शामिल होने की संख्या भी कुछ सौ तक ही रहती थी। कहते जरूर हैं कि बड़े यज्ञों से-राजसूय, वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों से मेलों आदि का चलन हुआ, लेकिन इतिहासकार दावा करते हैं कि ईसा पूर्व छह सौ साल पहले तक तो नदियों किनारे के मेलों का जिक्र मिलता है। 
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इस सम्राट के समय हुई शुरुआत!
करीब ढाई हजार साल पहले सम्राट चंद्रगुप्त के दरबार में यूनानी दूत मेगस्थनीज ने भी राजा को इस तरह के मेलों का विवरण दिया है। तब चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनान के शासक सेल्यूकस ने मेगस्थनीज को दूत बनाकर भेजा था। इसके बाद छठी शताब्दी मे चीनी यात्री ह्वेनसांग ने प्रयाग (वर्तमान इलाहाबाद) पर सम्राट हर्ष द्वारा आयोजित कुंभ में स्नान किया। हर्षवर्धन बेशक सनातन धर्म का अनुयायी था, लेकिन अन्य धर्मों के प्रति भी उदार नीति बरतता था। ह्वेनसांग ने उसकी बड़ी प्रशंसा की है। कादंबरी के लेखक बाणभट्ट उनके अनन्य मित्र थे। हर्ष की लिखी तीन नाटिकाएं नागानन्द, रत्नावली और प्रियदर्शिका संस्कृत साहित्य की अमूल्य निधियां हैं। दावे के साथ कहना कठिन है कि किस समय या उसके आसपास, कब कुंभ शुरू हुआ, लेकिन इतिहासकारों के अनुसार कुंभ पर्व हर्ष के समय या उसके आस-पास ही शुरू हुआ।
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