जानें श्रावण मास में 12 ज्योतिर्लिंगों की पूजा का महत्व और इससे जुड़ी प्रमुख मान्यताएं
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सोमनाथ ज्योतिर्लिंग
गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। शिवपुराण के अनुसार जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने क्षय रोग होने का श्राप दे दिया था, तब चंद्रदेव इसी स्थान पर तपस्या करके श्राप से मुक्त हुए थे। मान्यता है कि शिव के इस पावन धाम पर पूजा करने से साधक के क्षय, कोढ़ आदि रोग दूर हो जाते हैं। यहां पर देवताओं द्वारा बनवाया गया एक पवित्र कुण्ड भी है, जिसे सोमकुण्ड या पापनाशक-तीर्थ कहते हैं।
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मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग
आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित इस ज्योतिर्लिंग का अत्यंत महत्व है। मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। शास्त्रों में इस पावन शिव धाम की बड़ी महिमा बतायी गई है। महाभारत के अनुसार श्रीशैल पर्वत पर भगवान शिव का पूजन करने से अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है। शिव भक्तों का मानना है कि श्रीशैल के शिखर के दर्शन मात्र करने से ही साधक के सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं।
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महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
मध्य प्रदेश स्थित सप्तपुरियों में से एक प्राचीन उज्जैन नगरी में स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। जिनकी साधना-आराधना से जीवन से जुड़ी सभी प्रकार के भय दूर होते हैं। मान्यता है कि यहां पर शिव की साधना करने वाले साधक का काल भी कुछ नहीं कर पाता। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है।
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मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में शिव का यह पावन धाम स्थित है। इंदौर शहर के पास जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ॐ का आकार बनता है। मान्यता है कि व्यक्ति इस पावन तीर्थ में पहुंचकर अन्नदान, तप, पूजा आदि करता है, वह सभी सुख को भोगते हुए शिवलोक में स्थान प्राप्त होता है।
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