फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   know about the end of the world and the point of infinite

जानिए संसार के आदि-अंत और अनंत की बात

Sat, 18 Nov 2017 08:37 AM IST
इला कुमार
इला कुमार Updated Sat, 18 Nov 2017 08:37 AM IST
विज्ञापन
know about the end of the world and the point of infinite

उपनिषदों को नकारना संभव नहीं है। आप रामायण, महाभारत, भागवत, भगवान राम की तीर्थयात्रा को आधार बना कर लिखे गए ग्रंथ योगवासिष्ठ और यहां तक कि वेदों के समझ नहीं आने वाले मंत्रों और सूक्तों में भी छिद्रान्वेषण कर सकते हैं। उनमें कुछ और ज्यादातर प्रसंगों पर आक्षेप कर सकते हैं या उन वर्णनों के आधार पर ही उन्हें आपत्तिजनक करार दिया जा सकता है, लेकिन उपनिषदों पर आक्षेप नहीं कर सकते। निःसंदेह उपनिषद तत्व कठिन हैं, आसानी से समझ नहीं आने वाले हैं। फिर भी इस कठिन डगर पर चलने की हिम्मत जरूरी है। कुछ उपनिषदों और उनमे निहित तत्वों पर बात करते हैं, जिनकी चर्चा नहीं या कम ही होती है। शुरु शिवसंकल्पोपनिषद से करते हैं। 

विज्ञापन



सभी जानते हैं कि हमारा मन ही है, जो हमें हिम्मत देता है। उसी मन के लिए उपनिषद की ऋषि प्रार्थना करता है 'ज्योतिषं ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु!' कहा जाता है कि मन के जागे जाग है, तो उसी मन को समर्थ बनाने के लिए उपनिषद की ऋषि प्रार्थना करना सिखाता है। यह संदेश और संकल्प हमें बल प्रदान करता है, हमारे सामर्थ्य को बहुगुणित करता है। उपनिषद हमें लौकिक ज्ञान भी देते हैं। जैसे- गर्भोपनिषद बताता है कि गर्भ में स्थित प्राणी कैसे आकार लेता है। आरंभ में कलल यानि द्रव रूप, फिर कुछ द्रव और कुछ ठोस रूप, जिसे भ्रूण अवस्था भी कह सकते हैं। फिर उसके सिर, पैर, पीठ बनने के और हफ्तों- महीनों तक विकसित होने और 32 से 40 सप्ताह के बीच जन्म लेने की बात गर्भोपनिषद में इंगित की गई है। इस विवरण को पढ़कर विस्मय विमुग्ध रह जाना पड़ता है। विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन झलक दिखाता है कि उस जमाने में न्यूक्लियर साइकोलॉजी किस तरह स्थापित हुई होगी, सोचकर बुद्धि चकरा जाती है। 
विज्ञापन


पढ़ें- विवाह पंचमीः इस वजह से किया जाता है रामचरित मानस का अधूरा पाठ
विज्ञापन
विज्ञापन



उपनिषदों में वर्णित तथ्यों को नकारना संभव नहीं है, लेकिन यह निर्विवाद है कि इन रचनाओं में बिना किसी प्रयोगशाला और साधनों के जीवन की बारीकियों का वर्णन इतने जीवंत ढंग से किए गए हैं कि आधुनिकतम विकसित केंद्रों में भी उस स्तर को छुआ नहीं जा सकता। आश्रम उपनिषद में चारों आश्रमों की बात आती है, जिसके सोलह भेद, संस्कारों को बताया गया है। 'श्रच्त्वार आश्रमः षोडश भेदा भवन्ति।' इन भेदों या पड़ावों को पार करने और मंजिल तक आसानी से पहुंचने की दिशाधारा तय करने का पाठ पढ़ाया गया है। एक-एक कर चार पड़ावों, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यांसी के चार प्रकारों को खूबसूरती से विवेचित किया गया है। भेद उन व्यक्तियों के व्यवहार, निर्वाह एवं उपासना के आधार पर किए गए हैं न कि जन्म के आधार पर। व्यवहार द्वारा व्यक्ति का ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी या सन्यांसी के रूप में प्रतिष्ठित करना उच्च स्तरीय वर्गीकरण को इंगित करता है। 

know about the end of the world and the point of infinite

वज्रसूचिकोपनिषद में ‘ब्राह्मण’ की परिभाषा का सवाल है कि किसे ब्राह्मण कहेंगे? जीव को, देह को या कुल, वंश अथवा जाति को? और विभिन्न तरह की गिनती के साथ ‘नेति-नेति’ के द्वारा सभी को खारिज कर दिया जाता है। कहा जाता है कि जीव तो शरीर-दर-शरीर भ्रमण करता फिरता है। सभी की देह तो, पंच तत्वों से बनी है। कर्म कोई भी कर सकता है, तो केवल इनके आधार पर किसी को प्रतिष्ठित नहीं किया जा सकता। इस प्रकार किसी भी भाव की स्थापना व्यक्ति के व्यवहार के आधार पर की जाती है। कुछ इस तरह की जाती है, जो सत्य, ज्ञान, निर्विकल्प रहने वाला हो, अनुभव से ज्ञान प्राप्त किया हुआ हो, कृतार्थ होकर काम, राग आदि दोषों से रहित हो, शम-दम आदि युक्त, तृष्णा, मोह आदि से रहित तथा दंभ, अहंकार आदि से चित्त को सर्वथा पृथक रखने वाला हो, उसे ही ‘ब्राह्मण’ कहा जा सकता है। उपनिषदों में व्यक्ति के व्यवहार के बल पर, नियम पालन के आधार पर उसे ब्राह्मण पद पर प्रतिष्ठित किया जाता है न कि व्यक्ति के जन्म के आधार पर। 


उपनिषद भी कई अन्य तथ्यों-सत्यों को प्रकट करता है। मोक्ष के साधकों के लिए धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य कुछ नहीं। वह सब सहने वाले, सबको समान देखने वाले, मिट्टी के ढे़ले, पत्थर व सोने को एक समान देखने वाले, चारों वर्णों से भिक्षा लेने वाले, आत्मा को बंधन से मुक्त करने वाले होते हैं। उपनिषद हर उस शिक्षा को देने में सक्षम हैं, जिसकी जरूरत है। केनोपनिषद में पहले तो प्रश्न-पर-प्रश्न आता है कि किसके द्वारा यह मन सोचता-समझता है। किसके द्वारा प्राण नियोजित होता है, वाणी, नेत्रों और कर्णों को कौन देवता प्रेरित करता है? इसी क्रम में आगे बढ़ने पर सर्वव्यापक ब्रह्म को बड़े ही भावपूर्ण ढंग से इंगित कर दिया जाता है कि जिसे कोई नेत्रों के द्वारा देख नहीं सकता, लेकिन जिसके द्वारा नेत्रों को दर्शन शक्ति प्राप्त होती है उसे ही ब्रह्म जानना चाहिए। जो प्राणों के द्वारा प्रेरित नहीं हो सकता, लेकिन जिससे प्राण प्रेरित होता है, उसे ही ब्रह्म जानना चाहिए।

कल्पवृक्ष, अमर उजाला से साभार

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें आस्था समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। आस्था जगत की अन्य खबरें जैसे पॉज़िटिव लाइफ़ फैक्ट्स,स्वास्थ्य संबंधी सभी धर्म और त्योहार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed