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कार्तिक स्नान फल दिलाएगा त्रिकार्तिक व्रत
राकेश/इंटरनेट डेस्क।
Updated Mon, 05 Nov 2012 11:46 AM IST
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कार्तिक मास में प्रातः सूर्योदय से पूर्व स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करना उत्तम फलदायी माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार जो लोग संकल्पपूर्वक पूरे कार्तिक मास में किसी जलाशय में जाकर सूर्योदय से पहले स्नान करके जलाशय के निकट दीपदान करते हैं उन्हें विष्णु लोक में स्थान मिलता है।
लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियां आ जाती है कि कार्तिक स्नान का व्रत बीच में ही टूट जाता है, अथवा प्रातः उठकर प्रतिदिन स्नान करना संभव नहीं होता है। ऐसी स्थिति में कार्तिक स्नान का पूर्ण फल दिलाने वाला त्रिकार्तिक व्रत है।
त्रिकार्तिक व्रत कार्तिक पूर्णिमा से तीन दिन पहले शुरू होता है। त्रिकार्तिक व्रत रखने वाले को कार्तिक शुक्ल त्रियोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करना चाहिए। व्रत रखने वाले को परनिंदा से बचना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करें और पत्तल पर खाना खाएं। इन तीन दिनों में तेल लगाना वर्जित होता है।
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खाने में मटर, चना एवं मसूर की दाल का त्याग करना पड़ता है। व्रती पलंग पर नहीं सोना चाहिए। इस व्रत में भूमि पर सोने का नियम है। भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए त्रियोदशी से पूर्णिमा तक जितना संभव हो गीता, विष्णुसहस्रनाम एवं गजेन्द्रमोक्ष का पाठ करना चाहिए।
त्रिकार्तिक के विषय में शास्त्र कहता है कि त्रयोदशी के दिन व्रत का पालन करने से समस्त वेद प्राणी को पवित्र करते हैं। चतुर्दशी के व्रत से यज्ञ और देवता प्राणी को पावन बनाते हैं और पूर्णिमा के व्रत से भगवान विष्णु द्वारा पवित्र जल प्राणी को शु्द्ध करते हैं। इस प्रकार अंदर और बाहर से शुद्ध हुआ प्राणी भगवान विष्णु के लोक में शरण पाने योग्य बन जाता है।
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लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियां आ जाती है कि कार्तिक स्नान का व्रत बीच में ही टूट जाता है, अथवा प्रातः उठकर प्रतिदिन स्नान करना संभव नहीं होता है। ऐसी स्थिति में कार्तिक स्नान का पूर्ण फल दिलाने वाला त्रिकार्तिक व्रत है।
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त्रिकार्तिक व्रत कार्तिक पूर्णिमा से तीन दिन पहले शुरू होता है। त्रिकार्तिक व्रत रखने वाले को कार्तिक शुक्ल त्रियोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करना चाहिए। व्रत रखने वाले को परनिंदा से बचना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करें और पत्तल पर खाना खाएं। इन तीन दिनों में तेल लगाना वर्जित होता है।
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खाने में मटर, चना एवं मसूर की दाल का त्याग करना पड़ता है। व्रती पलंग पर नहीं सोना चाहिए। इस व्रत में भूमि पर सोने का नियम है। भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए त्रियोदशी से पूर्णिमा तक जितना संभव हो गीता, विष्णुसहस्रनाम एवं गजेन्द्रमोक्ष का पाठ करना चाहिए।
त्रिकार्तिक के विषय में शास्त्र कहता है कि त्रयोदशी के दिन व्रत का पालन करने से समस्त वेद प्राणी को पवित्र करते हैं। चतुर्दशी के व्रत से यज्ञ और देवता प्राणी को पावन बनाते हैं और पूर्णिमा के व्रत से भगवान विष्णु द्वारा पवित्र जल प्राणी को शु्द्ध करते हैं। इस प्रकार अंदर और बाहर से शुद्ध हुआ प्राणी भगवान विष्णु के लोक में शरण पाने योग्य बन जाता है।