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इसलिए है कार्तिक एकादशी से पूर्णिमा तक पुष्कर में स्नान का महत्व

अनीता जैन, वास्तुविद Updated Mon, 04 Nov 2019 11:56 AM IST
kartik purnima and pushkar snan importance
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राजस्थान राज्य के अजमेर शहर से 14 कि.मी. दूर उत्तर-पश्चिम में अरावली पहाड़ियों की गोद में बसा ’पुष्कर’नाम का कस्बा भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। अजमेर हिन्दू-मुस्लिम धर्म का संगम स्थल रहा है। अजमेर हिन्दू तीर्थ यात्रियों में जितना लोकप्रिय है उतना ही विश्वप्रसिद्ध “मोइनुद्धीन चिश्ती दरगाह“ के कारण मुसलमानों में भी। पुष्कर की प्राकृतिक सुन्दरता, धार्मिक वातावरण एवं मेले की चहल-पहल धार्मिक श्रृद्धालुओं के लिए स्वर्ग के समान है आज देश, विदेश में अपनी परम्पराओं, नृत्य कलाओं, आस्थाओं, मंदिरों, सरोवर और ग्रांम्याचल की सौंधी महक के लिए चर्चित यह नगर विश्वभर में अकेला ऐसा स्थान है जहाँ जगतपिता ब्रह्माजी का मन्दिर है, व पूजा अर्चना की जाती है, यहाँ अगस्त्य मुनि की गुफा भी है।
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पुष्कर की रचना
पुष्कर की रचना कैसे हुई इस विषय में पद्मपुराण समेत कई प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। ’पुष्कर’ का अर्थ है एक ऐसा सरोवर जिसकी रचना पुष्प से हुई हो। शास्त्रों के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी ने पृथ्वी पर यज्ञ करने की इच्छा प्रकट की थी उस वक्त धरती पर ’वज्रनाभ’ नामक राक्षस का आंतक फैला हुआ था। वह बच्चों को जन्म लेते ही मार देता था। ब्रह्माजी ने कमल के पुष्प से प्रहार कर इस दैत्य का वध कर दिया। यह पुष्प धरती पर उछलकर तीन जगह गिरा। तीनों ही स्थान पर जलधारा बहने लगी तथा सरोवर की उत्पत्ति हुई। ये तीनों सरोवर ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर, कनिष्ठ पुष्कर के नाम से प्रसिद्ध हुए। ज्येष्ठ पुष्कर में ब्रह्माजी ने यज्ञ किया, जिससे इस सरोवर को आदि तीर्थ होने का गौरव मिला, ब्रह्मा जी ने पुष्कर सरोवर में कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक यज्ञ किया तभी से पुष्कर में पाँच दिनों का धार्मिक मेला आयोजित होता आ रहा है। कहा जाता है कि इन पाँच दिनों के दौरान सभी देवी-देवता अंतरिक्ष से उतरकर पुष्कर में प्रवास करते है।ऐसी मान्यता है कि इस माह सरोवर में स्नान करने से पूरे एक साल के स्नान के बराबर पुण्य मिलता है तथा आखिरी पांच दिनों के दौरान ब्रह्मा जी समेत सभी 33 करोड़ देवी देवता पुष्कर में ही विद्यमान रहते है। सरोवर में डुबकी लगाने मात्र से अक्षय फल की प्राप्ति होती है।इसी दिन ब्रह्मा जी का ब्रह्म सरोवर पुष्कर में अवतरण हुआ था। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लाखों तीर्थ यात्री पुष्कर आते हैं, पवित्र पुष्कर सरोवर में स्नान कर ब्रह्मा जी के मंदिर में पूजा करते हैं दीपदान करते हैं।  एक अन्य कथा के अनुसार समुद्र मंथन से निकले ’अमृतघट’ को छीनकर जब एक राक्षस भाग रहा था तब उसमें से कुछ बूंदें इसी सरोवर में गिर गई तभी से यहाँ के पवित्र सरोवर का पानी अमृत के समान स्वास्थ्यवर्धक हो गया जिसकी महिमा एवं रोगनाशक शक्ति के बारे में इतिहास में अनेकों उदाहरण भरे पड़े है। 

ब्रह्मा मंदिर
सनातन धर्म के अनुसार तीन प्रधान देव माने जाते है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश। ब्रह्मा जी ने इस जगत की रचना की, विष्णुजी इस जगत का पालन करते है और महेश यानि भगवान शिव संहारक है। आपके मन में कभी तो प्रश्न उठता होगा कि हमारे देश में जहाँ भगवान विष्णु और महेश के इतने मन्दिर है, पर ब्रह्माजी के मंदिर क्यों नहीं? इसकी वजह है खुद ब्रह्माजी की पत्नी सरस्वती का श्राप। पुराणों के अनुसार एक बार ब्रह्माजी के मन में धरती की भलाई के लिए यज्ञ करने का ख्याल आया। यह यज्ञ वह सबसे शुभ समय परकरना चाहते थे। किन्तु उनकी पत्नी सरस्वती जिनका यज्ञ के समय रहना आवश्यक था, ने उन्हें इंतजार करने को कहा, काफी देर तक इंतजार करने के बाद भी जब सरस्वती यज्ञ स्थल पर नहीं पहुंची, तब ब्रह्माजी ने वही एक स्थानीय ग्वाल बाला से विवाह रचाया और यज्ञ में बैठ गए। सरस्वती थोड़ी देर से पहुंची। लेकिन यज्ञ में अपनी जगह पर किसी और स्त्री को देखकर वह क्रोधित हो गई। उन्होंने ब्रह्माजी को श्राप दिया कि जाओं इस पृथ्वी लोक में तुम्हारी कहीं पूजा नहीं होगी। पृथ्वीवासी तुम्हें भूल जाएंगे। सरस्वती के इस रूप को देखकर सभी देवता डर गए। उन्होंने उनसे विनती की कि अपना श्राप वापस ले लीजिए, लेकिन वो नहीं मानी। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सरस्वती ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में ही आपकी पूजा होगी। कोई भी दूसरा मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा। ब्रह्मा जी वो देवता है जिनके चार हाथ हैं। इन चारों हाथों में आपको चार किताबें देखने को मिलती है। ये चारों किताब चार वेद हैं, वेद का मतलब ज्ञान होता है, पद्म पुराण में कहा गया है कि ब्रह्मा इस स्थान पर दस हजार साल रहे थे, इन सालों में उन्होंने पूरी सृष्टि की रचना की थी, जिन पाँच दिनो में ब्रह्माजी ने यहाँ यज्ञ किया था वो कार्तिक महीने की एकादशी से पूर्णिमा तक का वक्त था, हर साल इसी महीने में यहाँ इस मेले का आयोजन होता है, हर साल एक विशेष गूंज कार्तिक के इन दिनों में यहाँ  सरोवर के आस-पास सुनाई पड़ती है जिसकी पहचान कुछ आध्यात्मिक गुरूओं को है । शास्त्रों के अनुसार इन पांच  दिनों में ब्रह्मण्ड की 33 कोटि शक्तियां यहाँ  मौजूद रहती है। ये शक्तियां उस ब्रह्मा की उपासना के लिए आती हैं जिनकी वजह से इस दुनिया का वजूद है इस दौरान सरोवर के पानी में एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति का जिक्र है जिससे सारे रोग दूर हो जाते हैं।यहाँ मंदिर का निर्माण संगमरमर पत्थर से हुआ है तथा इसे चांदी के सिक्कों से सजाया गया है, यहाँ मंदिर के फर्श पर एक रजत कछुआ है, ज्ञान की देवी सरस्वती के वाहन मोर के चित्र भी मंदिर की शोभा बढ़ाते हैं। यहां गायत्री देवी की एक छोटी प्रतिमा भी है, इस पवित्र मंदिर का प्रवेश द्वार संगमरमर का और दरवाजे चांदी के बने है। यहां  भगवान शिव को समर्पित एक छोटी गुफा भी है। 

पुष्कर झील
चारों तरफ हरी-भरी पहाड़ियों से घिरी हुई पुष्कर झील अपनी पवित्रता और प्राकृतिक सुंदरता के लिए पूरे विश्व में जानी जाती है । शास्त्रों के अनुसार पुष्कर झील उतनी ही पुरानी है जितनी की सृष्टि। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में एक बार पुष्कर की यात्रा अवश्य करनी चाहिए, इसका बनारस या प्रयाग की तरह की महत्व है। बद्रीनारायण, जगन्नाथ, रामेश्वरम्, द्वारका इन चार धामों की यात्रा करने वाले तीर्थ यात्री की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक वह पुष्कर के पवित्र जल में स्नान नहीं कर लेता। इस झील में नहाने के लिए 52 घाट बने हुए हैं जहाँ  दिल में गहरी धार्मिक आस्था लिए श्रृद्धालु पवित्र जल में डुबकी लगाते है।

सरस्वती मंदिर
ब्रह्मा की पहली पत्नी देवी सरस्वती का यह मंदिर ब्रह्मा मंदिर के पीछे एक पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए कई सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। मंदिर से नीचे पुष्कर सरोवर और आस-पास के गांवों का मनमोहक नजारा देखने को मिलता है। इनके अलवा यहाँ  बालाजी मंदिर, मन मंदिर, वराह मंदिर, आत्ममेश्वर महादेव आदि भी श्रृद्धा के प्रमुख केन्द्र हैं। प्राचीन धारणा के अनुसार यह कहा जाता है कि सारे तीर्थ बार-बार, पुष्कर तीर्थ एक बार, इसीलिए इसे तीर्थो का गुरू, पाँचवां धाम एवं पृथ्वी का तीसरा नेत्र कहा जाता है।
 
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