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होलाष्टक का ज्योतिषीय रहस्य: इन दिनों ग्रहों के उग्र प्रभाव से क्यों बढ़ती है नकारात्मकता
Tue, 24 Feb 2026 12:17 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Tue, 24 Feb 2026 12:17 PM IST
सार
आज, 24 फरवरी से होलाष्टक शुरू हो चुके हैं। होलाष्टक में शुभ कार्यों को करना वर्जित माना गया है। ज्योतिष मान्यता है कि इस अवधि में मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुण्डन, नामकरण आदि नहीं करने चाहिए।
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होलाष्टक 2026
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
Holashtak 2026: सनातन मान्यता के अनुसार फाल्गुन मास में आने वाला होलाष्टक एक विशेष धार्मिक समय माना जाता है। यह फाल्गुन कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरंभ होकर होलिका दहन तक चलता है। इन आठ दिनों को शास्त्रों में संयम, साधना और सावधानी का समय बताया गया है। ज्योतिष मान्यता है कि इस अवधि में मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुण्डन, नामकरण आदि नहीं करने चाहिए। वहीं इन दिनों को ग्रहों के उग्र प्रभाव से जोड़ा गया है, जिसके कारण मानसिक अस्थिरता और नकारात्मकता बढ़ सकती है।
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होलाष्टक का ज्योतिषीय महत्व
ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार होलाष्टक के आठों दिन अलग-अलग ग्रहों के प्रभाव से जुड़े होते हैं। अष्टमी को चंद्रमा नवमी को सूर्य दशमी को शनि एकादशी को शुक्र द्वादशी को गुरु त्रयोदशी को बुध चतुर्दशी को मंगल पूर्णिमा को राहु इन ग्रहों को इन तिथियों में उग्र माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि जब ग्रह अपनी तीव्र स्थिति में होते हैं, तब मनुष्य के विचार, निर्णय और भावनाओं पर उनका प्रभाव बहुत अधिक पड़ता है। चंद्रमा मन का कारक है, सूर्य आत्मबल का, शनि कर्म और संघर्ष का, जबकि राहु भ्रम और आशंकाओं से जुड़ा ग्रह माना जाता है। इसलिए इन दिनों व्यक्ति का मन अस्थिर हो सकता है और वह अनावश्यक चिंताओं में घिर सकता है।
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नकारात्मकता का कारण और प्रभाव
शास्त्रों के अनुसार पूर्णिमा से आठ दिन पूर्व ग्रहों का प्रभाव क्रमशः तीव्र होता जाता है। इसका असर व्यक्ति के मन और व्यवहार में दिखाई देता है। मन में शंका, भय और असमंजस की स्थिति बन सकती है। कई बार निर्णय लेने में कठिनाई होती है और छोटी-छोटी बातों पर तनाव बढ़ सकता है। इसी कारण शास्त्रों ने इस समय को शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना है। माना जाता है कि पूर्णिमा के दिन, जब होलिका दहन होता है और अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है, तब इन ग्रहों का उग्र प्रभाव शांत होने लगता है। वातावरण में उत्सव, उल्लास और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे मन का बोझ हल्का होता है और व्यक्ति पुनः संतुलित सोच के साथ आगे बढ़ पाता है।
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होलाष्टक से जुड़ी पारंपरिक मान्यता
होलाष्टक केवल ग्रहों के प्रभाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे एक लोकपरंपरा भी जुड़ी है। जिस स्थान पर होलिका दहन होना होता है, वहां अष्टमी से ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं। सबसे पहले उस स्थान को पवित्र करने के लिए गंगाजल का छिड़काव किया जाता है एवं रंगोली से सजाया जाता है। इसके बाद पेड़ों से गिरी हुई सूखी लकड़ियां, उपले और सूखी घास वहां एकत्रित की जाती हैं। आठ दिनों तक धीरे-धीरे लकड़ियों का संग्रह होता रहता है। यह प्रक्रिया केवल होलिका दहन की तैयारी नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता और एकता का प्रतीक भी मानी जाती है। गांव और मोहल्लों में लोग मिलकर इस कार्य को करते हैं, जिससे सामाजिक समरसता बढ़ती है।
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