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मानस की ये चौपाईयां दूर कर देंगी तुलसीदास के नारी विरोधी होने का भ्रम
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Updated Fri, 17 Aug 2018 02:50 PM IST
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tulsi nari
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भारतीय संस्कृति में तुलसीदास जी का अहम स्थान है। तुलसी ने रामचरितमान के जरिए न सिर्फ राम को महापुरुष के रूप में प्रस्तुत किया है बल्कि इस धार्मिक ग्रंथ के जरिए समाज में स्त्रियों महत्ता को भी तमाम चौपाईयों के जरिए व्यक्त किया है। आइए जानते हैं कि भक्तिभाव से पढ़ी जाने वाली श्री रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसी ने नारी के बारे में क्या विचार प्रकट किए हैं
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जननी सम जानहिं पर नारी ।
तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे ।।
मानव जीवन में नारियों के प्रति सम्मान को प्रतिस्थापित करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं कि जो पुरुष अपनी पत्नी के अलावा किसी और स्त्री को अपनी मां के सामान समझता है, उसी के ह्रदय में ईश्वर का वास होता है। जबकि इसके विपरीत जो पुरुष दूसरी स्त्रियों के संग संबंध बनाता है वह पापी होता है और वह ईश्वर से हमेशा दूर रहता है।
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ढोल गंवार शूद्र पशु नारी।
सकल ताडना के अधिकारी।।
तुलसीदास जी की इस चौपाई के जरिए कुछ लोग तुलसीदास जी को नारी विरोधी बताते हैं लेकिन वास्तविकता ये है कि जो संत माता पर्वती के लिखते समय इस वाक्य का प्रयोग करते हैं कि उनके जन्मते ही धरती पर चारो तरफ खुशहाली छा गई। इसी तरह रामचरित मानस में माता सीता के सम्मान में तमाम तरह के शब्दों का प्रयोग करते हैं। उनके द्वारा लिखी गई रामचरितमानस में श्री हनुमान जी को अष्ट सिद्धि नव निधि दाता होने का आशीष भी माता सीता के द्वारा दिए जाने की कही जाती है।
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धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी।
आपद काल परखिए चारी।।
तुलसीदास जी ने मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए जिन प्रमुख लोगों के योगदान की चर्चा अपनी चौपाई में की है, उसमें नारी को विशेष रूप से शामिल किया गया है। तुलसीदास जी ने चौपाई के जरिए कहा है कि धीरज, धर्म, मित्र और नारी की परीक्षा कठिन परिस्थितियों में ही की जा सकती है।
सो परनारि लिलार गोसाईं।
तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥
तुलसीदास जी इस चौपाई के माध्यम से मनुष्यों को समझााने के प्रयास कर रहे हैं कि जो व्यक्ति अपना अपना कल्याण, सुंदर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकार के सुख चाहता हो, वह उसी प्रकार परस्त्री का मुख न देखें जैसे लोग चौथ के चंद्रमा को नहीं देखते। तुलसीदास जी ने लोगों को इस चौपाई के जरिए स्त्री के सम्मान को सुरक्षित करते हुए मनुष्य को कुदृष्टि से बचने को कहा है।
मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना।
नारी सिखावन करसि काना।।
तुलसीदास जी इस दोह के जरिए लोगों को यह समझाने की कोशिश की है कि यदि कोई आपके फायदे की बात कर रहा हो तो आप अपने अभिमान को भूलकर उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। तुलसीकृत रामचरितमानस के इस दोहे में प्रभु श्री राम सुग्रीव के बड़े भाई बाली के सामने एक स्त्री का सम्मान करते हुए कहते हैं कि दुष्ट बाली, तुम तो अज्ञान पुरुष हो ही, लेकिन अभिमान के चलते तुमने अपनी विद्वान पत्नी की बात भी नहीं मानी और तुम हार गए।