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श्रावणी पर्व: जिस दिन धरती पर जीवन जागा

Sat, 25 Aug 2018 05:41 PM IST
पांडुरंग शास्त्री
पांडुरंग शास्त्री Updated Sat, 25 Aug 2018 05:41 PM IST
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facts about shravani upakarma

श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के दिन हेमाद्रि संकल्प और श्रावणी उपाकर्म भी किया जाता है। नैष्ठिक साधक के लिए दोनों कर्म अनिवार्य हैं। इसके अंतर्गत दशविधि स्नान आते हैं। इनमें भस्म, मृतिका, गोमय, पंचगव्य, गोरज, धान्य, स्नान, फल, सर्वोषधि (हल्दी इत्यादि), कुशोदक और हिरण्य (स्वर्ण) स्नान के बाद पितरों का तर्पण और ऋषियों का आवाहन पूजन किया जाता है। नया जनेऊ धारण किया जाता है। श्रावण पूर्णिमा यज्ञोपवीत बदलने से लेकर भाई-बहनों में रक्षाबंधन और शुभ संकल्पों के साथ व्यापारियों के समुद्रपूजन का मिलाजुला उत्सव है।

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यज्ञोपवीत संस्कार को उपनयन भी कहा गया है। इस संस्कार से विद्यार्थी को गुरु के पास लाया जाता है, इसलिए इसे उपनयन कहते हैं। दीक्षा वह जो दिशा बताए और दृष्टि खोले। इस अर्थ में उपनयन का अर्थ दूसरी आंख या नई दृष्टि भी होता है। यज्ञोपवीत संस्कार का एक उपचार होता है मेखला बंधन। मेखला बंधन अर्थात व्रतबंधन, आने वाली कठिनाइयों से संघर्ष की तत्परता का संदेश है मेखला बंधन। जीवन के देवासुर संग्राम में आसुरी वृत्ति हावी न हो, इसके लिए सतत जागृति की आवश्यकता है। विभिन्न कर्मकांडों का संदेश यह भी है कि बाहरी शासन कितना ही समर्थ क्यों न हो, बदलाव लाने या संस्कारित करने में असफल ही रहता है। 
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इन संस्कारों में गुरु की या आचार्य की प्रमुख महत्ता है। जैसे माता-पिता के संतुलित सहयोग से काया जनती है, वैसे ही गुरुकृपा और शिष्य के समर्पण से साधक द्विज बनता है। बीज प्रकृति के प्रति समर्पण दिखाता है। उसके प्रवाह में अपना अस्तित्व मिलाने-गलाने के लिए तैयार होता है, तो प्रकृति का भी प्रभाव दिखाई देने लगता है। साधक जब अपनी सीमित क्षमताओं को समर्थ गुरु के प्रति समर्पित कर देता है तो एक जीवंत साधक का जन्म होता है, जिसके पुरुषार्थ के सुफल परिवार एवं समाज को धन्य बनाने लगते हैं। ऐसे समर्पित साधक को द्विज की संज्ञा दी जाती है। 

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श्रावणी पर्व का संदेश है कि दोनों प्रक्रियाएं प्रखर बनें। समर्थ गुरु और समर्पित साधक इस दिशा में पहल करें। किए गए संकल्प और अपनाए गए अनुशासन के निर्वाह में जो भूल हुई हों, उन्हें चिह्नित कर, उसके अनुसार प्रायश्चित करें। लाभ उठाना है, तो केवल पर्व के दिन ही कुछ कर लेना काफी नहीं है। सतत प्रयास जरूरी है। पर्व पर दो प्रक्रियाएं खासकर अपनाई जाती हैं। एक पहले अपनाए गए अनुशासन संकल्पों के निर्वाह में जो भूल हुई हों, उन्हें ठीक करने के लिए प्रायश्चित्त करना और आगे के लिए बेहतर लक्ष्य निर्धारित करना। उन्हें निष्ठा से निभाने का संकल्प और उन्हें पूरा करने के लिए ऋषियों, देवताओं से उचित शक्ति अनुदान प्राप्त करना। इसके लिए देवपूजन तथा रक्षाबंधन, पौधरोपण जैसे उपचार किए जाते हैं।

तीन चरणों में प्रायश्चित का विधान पूरा होता है। गलतियों को स्वीकार करना, उन्हें स्वीकार करने का साहस, गलतियों के लिए तप और इष्टापूर्ति अर्थात जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई करना। तीनों चरण जिस ईमानदारी से उठाए और गिनाए जाते हैं, उसी अनुपात में ऋषियों और देवताओं के अनुग्रह भी साधक के साथ जुड़ जाते हैं। पर्व पर हेमाद्रि संकल्प सहित दस स्नान, शिखावंदन, यज्ञोपवीत पूजन और धारण के साथ, देव और ऋषि पूजन के लाभ तैयारी के साथ श्रद्धा व निष्ठा से विधि-विधान के साथ पूरा करने पर ही मिलते हैं।

मशीनी ढंग से कर्मकांड पूरे कर लेने भर से कोई लाभ नहीं होता। अपने भावों, विचारों और कर्मों को पाशविक संकीर्णता से ऊपर उठने का संकल्प कोई भी ले सकता है। वैसे प्रयास भी कर सकता है। पुरुषसूक्त के अनुसार, जन्म से तो सभी श्रम की क्षमता लिए रहते हैं। संस्कार से वे द्विज बन जाते हैं। वर्ण चार हैं। चारों वर्ण समाज में ज्ञान और संस्कार के साथ सुरक्षा, समृद्धि और श्रम की आवश्यकताएं पूरी करते हैं। समाज को उठाने और आगे बढ़ाने में चारों का योगदान होता है।

सभी वर्गों को अपने भीतर बीज रूप में मौजूद देवत्व को जागृत करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति खिलाड़ी की पोशाक पहन ले, खेल के नियम याद कर ले, तो इतने मात्र से वह खिलाड़ी नहीं बन सकता। उसे अपने स्वास्थ्य और कौशल को खेल के नियमों के अनुसार गढ़ना होता है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति सरगम और रागों को रट ले, उन्हें ठीक से गा न सके, तो वह संगीतज्ञ की भूमिका पूरी नहीं कर सकता। इसी प्रकार ब्राह्मण, वानप्रस्थ या सन्यासी का वेश बना लेने, उसके नियमों को याद कर लेने से कोई उस वेश विन्यास को चरितार्थ नहीं कर सकता।

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