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आज भी कोल्हापुर में भिक्षा मांगते हैं भगवान विष्णु के यह अवतार

Fri, 05 Dec 2014 08:55 AM IST
रजनी ओसवाल
रजनी ओसवाल Updated Fri, 05 Dec 2014 08:55 AM IST
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duttatrey jyanti vishnu avtar

ईश्वर और गुरु की एकरूपता यानी श्री दत्तात्रेय, जिन्हें गुरुओं का श्री गुरुदेवदत्त या सद्गुरु भी कहते हैं। शैव, वैष्णव और शाक्त तीनों ही संप्रदायों को एकजुट करने वाले श्री दत्तात्रेय का प्रभाव हजारों सालों से महाराष्ट्र में ही नहीं, वरन विश्व में टिका हुआ हैं।

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एकमुखी दत्त यानी विष्णुरूपी दत्तात्रेय महासती अनुसूया और ऋषि अत्रि के आश्रम में जन्म लेकर ब्रह्मा और महेश तो अंतर्ध्यान हो गए, लेकिन विष्णु वहीं रह गए। सो विष्णुरूपी श्री दत्तात्रेय के नाम से जाने गए।
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ऋषि अत्रि और सती अनुसूया के यहां जन्मे भगवान श्री दत्तात्रेय ईश्वर का साधक को दिया वरदान है मान्यता है कि प्रयाग सिंहाचल के समीप आश्रम से वे रोज पाचाळेश्वर में स्नान व कोल्हापुर में भिक्षा माँगने के उपरांत मादुरगढ़ में शयन करते हैं।
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शास्त्र पुराणों के अनुसार दत्रात्रेय के शिष्य भी चौबीस हैं और चौबीस ही गुरू। शिष्यों में आप एक से एक धु्रंधर प्रतिभाएं देखेंगे लेकिन गुरू के संबंध में उनकी धारणा अनूठी ही है। उन्होंने छोटे मोटे कीट पतंगों से लेकर अति बलशाली जीवजंतुओं को गुरु बनाया। ऐसे गुरुओं की संख्या 24  हैं। इन गुरुओं में सूर्य, चन्द्र और पृथ्वी से लेकर कीड़े, कबूतर, अजगर, मधुमक्खी, हाथी, हिरण, मछली तक शामिल है।


इन गुरुओं में प्रत्येक से एक संदेश और संस्कार लेकर अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। दत्तात्रेय के चयन में यह विशेषता स्पष्ट दिखाई देती है। साधु संगठनों के परमआराध्य दत्तात्रेय गृहस्थ भी उतनी श्रद्धा निष्ठा से मानते हैं।

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