भगवान की पूजा करते समय भाव रखना बेहद जरूरी
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कभी भी कुछ भगवान को अर्पित करें, तो प्रेम से अर्पित करें। दुर्भावों से युक्त मन नहीं चलेगा। मन में प्रेम उपजाएं और उसे ही प्रवाहित करते हैं। उसके बाद समर्पण करो, तो भगवान स्वीकार करेंगे। यह हुआ कल्याण का मार्ग। जहां-जहां भी पूजा की बात आती है, वहां-वहां जरूर पुराणों में, स्मृतियों में, इतिहास में कहीं भी कहा कि उन्होंने पूजन किया, तो यह जरूर कहते हैं कि प्रेम के साथ पूजन किया। भरत जी पूजन करते हैं राम की चरण पादुका का। नंदी ग्राम में सिंहासन पर प्रतिष्ठित करके राजा के रूप में उनका सम्मान करते हैं। उनकी आज्ञा लेते हुए पूरे राज्य का संचालन भरत जी कर रहे हैं। यहां से रामराज्य शुरू हो गया।
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राम जी की चरण पादुका राज्य का संचालन कर रही है। तुलसीदास ने अयोध्या कांड के अंत में लिखा है 'नित पूजत प्रभु पांवरी'। भरत जी पादुका की रोज पूजा करते हैं। भरत जी जानते हैं, मेरे साथ चरण पादुका जी आई हैं, मैंने उनको तैयार करवाया। भरत चरण पादुका का पूजन कैसे करते थे, काकभुषुंडी रामायण में उनका वर्णन मिलता है। ध्यान दीजिए कि भरत जी पूजन कैसे करते हैं? तुलसीदास जी ने लिखा - प्रीति न हृदयं समाति। जैसे नदी अपने तटों को लांघ जाती है, उछाल लेकर तटों से बाहर आ जाती है, अब तट नहीं रह पाए, तट सामर्थ्यहीन हो गए, वैसे ही प्रेम इतना उमड़ना चाहिए कि लगे कि आप संभाल नहीं पा रहे हैं। भरत जी ऐसा पूजन करते हैं। तुलसीदास जी को बड़ा ज्ञान है शास्त्रों का, उन्हें मालूम है कि कैसे भक्ति होती है। भगवान की कृपा से जब भी अवसर मिले, तो पूरे भाव से पूजन करें। हमें अपना संपूर्ण जीवन मोक्ष के लिए ही जीना चाहिए। तो गृहस्थी कैसे चलेगी? हमारा देखना, बैठना, बोलना सब मोक्ष के लिए है।